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भारत के खिलाफ नेपाल का दुर्भाग्यपूर्ण कदम

भारत के सामने दुविधा यह हैकि वह नेपाल की समस्या से न तो मुंह मोड़ सकता है और न ही उस पर ज्यादा दबाव डाल सकता है।

भारत के खिलाफ नेपाल का दुर्भाग्यपूर्ण कदम
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नए संविधान के कुछ प्रावधानों को लेकर नेपाल के मधेसी और थारू समुदाय के लोगों का विद्रोह पड़ोसी देश को दोराहे पर खड़ा कर दिया है। एक वर्ग गर्व कर रहा है, वहीं दूसरा सड़कों पर आ गया है। इसके कारण वहां जो हालात पैदा हुए हैं उसने न सिर्फ नेपाल, बल्कि भारत को भी चिंता में डाल दिया है। एक तरफ जहां नेपाल में जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया है, वहीं दूसरी तरफ वहां के लोगों में भारत विरोधी भावनाएं पैदा होने लगी हैं। जिस तरह से दोनों देश सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से गहराई से जुड़े हुए हैं उसे देखते हुए इसे शुभ नहीं कहा जा सकता है। माना जा रहा हैकि वहां के कुछ नेता भारत के खिलाफ तल्ख बयानबाजी कर इस तरह की भावनाओं को उभारने का काम कर रहे हैं। नेपाल के उपप्रधानमंत्री प्रकाश मान सिंह का संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून से मिलकर भारत पर आर्थिक नाकेबंदी का आरोप लगाना इसका प्रमाण है। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा में नेपाल के प्रतिनिधि ने संकेत में भारत पर यह आरोप मढ़ा कि वह उनके देश में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में बाधाएं खड़ी कर रहा है, जिससे वहां जरूरी सामानों की किल्लत हो गईहै। यह पहला मामला है जब इस पर्वतीय राष्ट्र ने किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत विरोधी रुख अपनाया है। हालांकि भारत की ओर से बार-बार इन आरोपों को बेबुनियाद बताया जाता रहा है। भारत सरकार स्पष्ट रूप से कह चुकी हैकि उसके द्वारा आवश्यक वस्तुओं की आपूर्तिपर किसी तरह की रोक नहीं लगाई है। दरअसल, भारत से गए ट्रक नेपाल की सीमा में इसलिए प्रवेश नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि मधेसी आंदोलनकारियों ने सभी रास्तों को एक तरह से अवरुद्ध कर दिया है। जाहिर है, भारत वाहनों को सिर्फ अपनी सीमा तक ही पहुंचा सकता है। इसके बाद इसे सुरक्षित रूप से ले जाने की जवाबदेही नेपाल सरकार की है। विचित्र हैकि नेपाल की सत्ता में बैठे नेता इस बात को समझने को तैयार नहीं हैं। भला भारत कैसे यह सुनिश्चित कर सकता हैकि उसके वाहन नेपाल की सीमा में पहुंचें। ऐसा नहीं है कि नेपाल के नेता संविधान के विवादित प्रावधान को लेकर मधेसी और थारू समुदाय के लोगों की आपत्तियों से अनजान हैं, लेकिन हैरानी की बात यह भी है कि वे अपने लोगों की बात सुनने को तैयार नहीं हैं। फिलहाल वे उनकी मांगों को नजरअंदाज करते नजर आ रहे हैं। शुरू में संविधान निर्माताओं ने कहा था कि नेपाल का नया संविधान सभी समुदायों के हितों की रक्षा करने वाला होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भारत के सामने दुविधा यह हैकि वह नेपाल की समस्या से न तो मुंह मोड़ सकता है और न ही उस पर ज्यादा दबाव डाल सकता है। दोनों देशों के लोगों के बीच भले ही रोटी-बेटी के संबंध हैं, खुली सीमाएं हैं जिससे कि लोग बिना बाधा के आते-जाते हैं, लेकिन नेपाल एक संप्रभु राष्ट्र है। भारत बस उससे आग्रह कर सकता हैकि वह मौजूदा संकट का जल्द से जल्द निदान खोजे। वहां के नेताओं को भारत पर बेवजह आरोप लगाने के बजाय वार्ताके जरिए अपने लोगों के असंतोष दूर करने की कोशिश करनी चाहिए। वहीं मधेसी और थारू समुदाय के लोगों को भी आंदोलन का रास्ता छोड़ वार्ता की संभावना तलाशनी चाहिए क्योंकि यह समस्या बातचीत से ही हल होनी है।
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