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चिंतन: मथुरा की हिंसा यूपी सरकार की विफलता

मथुरा हिंसा कांड में यूपी पुलिस की लापरवाही सामने आना सपा सरकार के लिए नई बात नहीं है।

चिंतन: मथुरा की हिंसा यूपी सरकार की विफलता
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उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार की एक बार फिर पोल खुली है। मथुरा हिंसाकांड में खराब कानून व्यवस्था के लिए बदनाम इस सरकार की बड़ी विफलता उजागर हुई है। खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने स्वीकार किया है कि मथुरा में कार्रवाई के दौरान यूपी पुलिस और खुफिया तंत्र की बड़ी 'चूक' हुई है। कार्रवाई से पहले पुलिस की तैयारी दुरुस्त नहीं थी।

हालांकि उन्होंने पुलिस का बचाव भी किया है कि पुलिस को यह अंदाजा नहीं था कि वहां लोग हथियारबंद होंगे और हमलावर पुलिस पर टूट पड़ेंगे। मथुरा हिंसा कांड में यूपी पुलिस की लापरवाही सामने आना सपा सरकार के लिए नई बात नहीं है। इससे पहले भी मुजफ्फरनगर दंगे के दौरान, बरेली हिंसा के दौरान पुलिस की कमजोरी सामने आ चुकी है।

सपा विधायकों और मंत्रियों के द्वारा भी कानून हाथ में लेने की खबरें आती रहती हैं। यूपी की सपा सरकार पर असामाजिक तत्वों पर नकेल नहीं कसने के आरोप लगे रहे हैं। उत्तर प्रदेश में यह धारणा बन गई है कि जब-जब सपा की सरकार सत्ता में आती है, गुंडागर्दी बढ़ जाती है। पिछली दफा जब सपा सत्ता में आई थी, तो पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बेदाग और पढ़े-लिखे छवि वाले अखिलेश यादव को प्रदेश की कमान सौंपी थी। उस समय उम्मीद जताई गई थी कि अखिलेश युवा हैं, नई सोच वाले हैं, तो एक अच्छी सरकार देंगे और इससे सपा की छवि भी सुधरेगी। लेकिन उनके करीब चार साल के शासन में ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। प्रदेश की कानून व्यवस्था नहीं सुधरी, उल्टे बद से बदतर होती गई। अखिलेश भी परंपरागत सपाई ही साबित हुए हैं। उनका नौसिखियापन सामने आया। वे कई मौके पर विफल साबित हुए। उनके शासन को देखकर लगता है कि सत्ता की असली कमान किसी और के पास है। मुलायम ने दिखाने के लिए कई बार अपने बेटे अखिलेश की सरकार की आलोचना की है। लेकिन यह उनकी राजनीति का हिस्सा थी।

कृष्णनगरी मथुरा के उद्यान विभाग की सरकारी जमीन जवाहर बाग में वर्ष 2014 से अवैध कब्जा था और वहां कुछेक लोगों की समानान्तर सत्ता चल रही थी, फिर भी यूपी सरकार आंखमूंदी हुई थी। आखिर यह कैसी सरकार है। अखिलेश यादव दूसरे दल पर इस अवैध कब्जे का आरोप भी नहीं लगा सकते, क्योंकि यह उनके ही शासनकाल में हुआ है। गाजीपुर के रहने वाले रामवृक्ष यादव ने अपने करीब तीन हजार सहयोगियों के साथ जवाहरबाग पर कब्जा किया था। वे जयगुरुदेव के चेला बताए जाते हैं। बाद में वे उनसे अलग हो गए थे। वे खुद को सुभाष चंदबोस के आजाद हिंद फौज के विचारों से प्रभावित बताते हैं और सत्याग्रही कहते हैं। उनकी मांगे भी अजीब है। पेट्रोल और डीजल एक रुपये प्रति लीटर की जाए। देश में सोने का सिक्का चले। आजाद हिंद बैंक करेंसी से लेन-देन हो। जवाहरबाग की 270 एकड़ जमीन सत्याग्रहियों को सौंप दी जाए। अंग्रेजों के समय के कानून खत्म किए जाएं। पूरे देश में मांसाहार पर बैन हो। रामवृक्ष के अवैध कब्जे से मथुरा प्रशासन तंग था, कई बार सरकार जमीन को मुक्त कराने की कोशिश की गई थी। बात इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंच गई थी।

एक याचिका की सुनवाई में हाईकोर्ट ने अवैध कब्जा हटाने के निर्देश दिए थे। पुलिस कोर्ट के आदेश पर अमल करने गई थी, जब यह हिंसा हुई। दो पुलिसकर्मी शहीद हुए और करीब 25 कब्जेधारी भी मारे गए। इनमें अधिकांश आग में जल कर मरे। यूपी सरकार मामले के जांच के आदेश दिए हैं और केंद्रीय गृहमंत्री ने यूपी सरकार से रिपोर्ट मांगी है। इस हत्याकांड पर राजनीति भी हो रही है, जोकि नहीं होनी चाहिए थी। लेकिन अहम सवाल है कि आखिर जवाहर बाग में असलहों का जखीरा कैसे पहुंचा? जांच में जो भी दोषी हो, उन्हें सजा अवश्य मिलनी चाहिए। इसी के साथ लोकतंत्र में किसी को भी कानून हाथ में लेने का हक नहीं है। रामवृक्ष यादव को यह हक कतई नहीं है। चुनी हुई सरकार को भी इस तरह की स्थिति पैदा नहीं होने देने के लिए कृतसंकल्प होना चाहिए।

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