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चिंतन: गुलबर्ग पर आया फैसला न्याय व्यवस्था की जीत

इस केस में भी एसआईटी ने 2010 में नरेंद्र मोदी से पूछताछ की थी, लेकिन एसआईटी ने उन्हें क्लीनचिट दे दी थी।

चिंतन: गुलबर्ग पर आया फैसला न्याय व्यवस्था की जीत
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भारतीय न्याय व्यवस्था ने एकबार फिर अपनी विश्वसनीयता प्रमाणित की है। गुलबर्ग सोसाइटी केस में 14 साल बाद आया फैसला इसी की पुष्टि करता है। गुजरात में 2002 दंगे के दौरान गुलबर्ग सोसाइटी हत्याकांड केस में स्पेशल कोर्ट ने 24 लोगों को दोषी करार दिया है। इनमें 11 आरोपियों को सीधे हत्या का दोषी ठहराया गया है। 13 लोगों को दूसरे आरोपों में दोषी करार दिया है। 36 लोग बरी कर दिए गए हैं। बरी होने वालों में भाजपा नेता बिपिन पटेल भी हैं। 29 फरवरी 2002 में गोधरा कांड के बाद गुजरात में दंगा भड़का था।

गोधरा में अयोध्या से ट्रेन से लौट रहे कार सेवकों को जिंदा जला दिया गया था। इसके बाद करीब 20 हजार लोगों की उग्र भीड़ ने गुलबर्ग सोसायटी पर हमला कर दिया था। इसमें कांग्रेस के पूर्व सांसद अहसान जाफरी समेत 69 लोग मारे गए थे। इस हत्याकांड की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एसआईटी गठित की गई थी। एसआईटी ने जांच के बाद 66 आरोपियों को गिरफ्तार किया था। मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने ही स्पेशल कोर्ट का गठन किया था। शीर्ष अदालत ने स्पेशल कोर्ट को 31 मई तक फैसला सुनाने को कहा था। 15 सितंबर 2015 को सुनवाई खत्म हो गई थी।

कोर्ट का यह फैसला कई मायनों में महत्वपूर्ण है। पहला यह कि देर से ही, पर इंसाफ हुआ है। दूसरा यह कि इस इंसाफ से यह धारणा टूटी है कि 'भीड़ को सजा देना कठिन है, क्योंकि भीड़ में से असली आरोपी को पहचानना मुश्किल है, उनके खिलाफ आरोप सिद्ध करना और फिर उन्हें न्याय के कटघरे तक पहुंचाना बहुत मुश्किल है।'

लेकिन एसआईटी ने यह कर दिखाया है। उसने भीड़ में से गुनहगारों को अदालत तक पहुंचाया है। अब भीड़ बनाकर दंगा करने वालों के सामने यह फैसला नजीर की तरह होगा कि वे कानून से बच नहीं सकते। इससे भीड़ के जरिये गुनाह करने की प्रवृति पर लगाम लगेगा। हमारे देश में सियासी फायदे के लिए भीड़ का इस्तेमाल आम बात है। इस फैसले में तीसरी अहम बात है कि कोर्ट ने गुलबर्ग हत्याकांड के पीछे किसी साजिश से इनकार किया है।

गुजरात में हुए दंगे को लेकर अब तक यही प्रचारित किया गया कि यह साजिश थी। कांग्रेस ने इस साजिश का आरोप गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगाया था। कांग्रेस नेताओं ने तो यहां तक आरोप लगा दिया था कि मोदी की सियासत गुजरात दंगे के खून से सनी है। पूर्व रेलमंत्री व पूर्व सीएम लालू प्रसाद जैसे नेता भी गुजरात दंगे के लिए मोदी पर ही निशाना साध रहे थे। समाजसेवी तीस्ता सीतलवाड़, बुद्धिजीवी अरुन्धती राय समेत कई संगठनों ने मोदी के खिलाफ मोर्चा ही खोल दिया था। उन पर दंगे करवाने के तोहमत लगाए गए थे।

इस केस में भी एसआईटी ने 2010 में नरेंद्र मोदी से पूछताछ की थी, लेकिन एसआईटी ने उन्हें क्लीनचिट दे दी थी। यही नहीं गुजरात दंगों से जुड़े सभी मामलों में शीर्ष अदालत तक से मोदी को क्लीनचिट मिली हुई है। ऐसे में गुजरात दंगों को साजिश बता कर मोदी को घसीटने वालों को गुलबर्ग केस पर आया यह फैसला एक बार फिर करारा जवाब है। नरोदा पाटिया केस में भी तत्कालीन भाजपा नेता बेगुनाह साबित हुए हैं और तत्कालीन मोदी सरकार बेदाग निकली है। यह फैसला किसी भी दंगे को लेकर हमेशा भाजपा को कटघरे में खड़ा करने वालों को कड़ा संदेश भी है। दोषियों को सजा तो छह जून को सुनाई जाएगी, लेकिन आम लोगों का एक बार फिर न्याय व्यवस्था पर भरोसा मजबूत हुआ है कि कोई गुनाह करके बच नहीं सकता।

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