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आलोक पुराणिक का लेख : संकट से उबरती अर्थव्यवस्था

अप्रैल से जून 2021 के दौरान यानी मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में देश की जीडीपी ग्रोथ रेट 20.1% रही है। यानी पिछले साल की इसी तिमाही-अप्रैल जून 2020 के मुकाबले देश की जीडीपी में 20 फीसदी से ज्यादा का उछाल देखने को मिला है, लेकिन इस उछाल की मुख्य वजह है पिछले साल की इसी अवधि के दौरान दर्ज की गई भारी गिरावट।अर्थव्यवस्था को लेकर दो तरह के आकलन संभव हैं। एक तो यह कि कोरोना के इतने लंबे समय मार्च 2020 से सितंबर 2021 तक खिंचने के बावजूद भुखमरी जैसे विकट संकट के समाचार नहीं हैं, न्यूनतम खाने-पीने की व्यवस्था अर्थव्यवस्था में सबकी हो पा रही है।

आलोक पुराणिक का लेख : संकट से उबरती अर्थव्यवस्था
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आलोक पुराणिक

आलोक पुराणिक

विदेशी मुद्रा कोष की स्थिति से अगर अर्थव्यवस्था का आकलन होता हो, तो निश्चय ही भारतीय अर्थव्यवस्था अपने बेहतरीन समय से गुजर रही है, बेहतरीन ही नहीं, ऐतिहासिक तौर पर विशिष्ट समय से गुजर रही है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार नए रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया है। 27 अगस्त 2021 को खत्म हुए सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार 16.663 अरब डॉलर बढ़कर 633.558 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। उधर शेयर बाजार भी धूम मचाए हुए है। 3 सितंबर 2021 को बंद हुए शेयर बाजार में मुंबई शेयर बाजार का सूचकांक करीब 49 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दिखा रहा था, सालभर में। यह बढ़ोत्तरी खासी उत्साहजनक है।

कोरोना संकट के कारण आई गिरावट से उबरते हुए देश की जीडीपी ग्रोथ अप्रैल-जून 2021 तिमाही के दौरान 20.1% पर पहुंच गई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, यह 1990 से लेकर अब तक के किसी वित्त वर्ष की किसी भी तिमाही की सबसे बेहतरीन वृद्धि है। केंद्र सरकार के प्रमुख आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने कहा-अगर तीसरी लहर का सामना नहीं करते हैं तो हम अक्टूबर-दिसंबर तिमाही तक प्री-कोविड लेवल तक पहुंचने में सक्षम होंगे। कोविड पूर्व की अवस्था तक पहुंचना यानी लगभग सामान्य स्थितियों की ओर जाने जैसा ही है। खासकर सरकार में इस बात को लेकर बहुत आत्मविश्वास है कि सरकार के पास संसाधनों की कमी नहीं है। केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार के दावे मूलत केंद्र सरकार के ही दावे माने जा सकते हैं। उनका मानना है कि हम बहुत तेजी से अर्थव्यवस्था का विस्तार करने की स्थिति में हैं। यहां तक कि अगर हम तीसरी लहर की चपेट में आते हैं, तो भी हमारे पास इससे निपटने के लिए वित्तीय संसाधन हैं। हमारा राजकोषीय घाटा बहुत नियंत्रित है। तीसरी लहर से निपटने के इंतजाम हैं संसाधन हैं-ऐसे दावे जहां एक और आश्वस्ति देते हैं, पर दूसरी तरफ कुछ सवाल भी रेखांकित करते हैं कि अगर सब ठीक ही है, तो फिर कई उद्यमों में संकट क्यों है। सेवा क्षेत्र जैसे होटल, पर्यटन में अब भी वैसी हरियाली क्यों नहीं है।

अर्थव्यवस्था को लेकर दो तरह के आकलन संभव हैं। एक तो यह कि कोरोना के इतने लंबे समय मार्च 2020 से सितंबर 2021 तक खिंचने के बावजूद भुखमरी जैसे विकट संकट के समाचार नहीं हैं, न्यूनतम खाने-पीने की व्यवस्था अर्थव्यवस्था में सबकी हो पा रही है, भले ही सबको बेहतरीन काम और संसाधन ना भी मिल रहे हों। यह छोटी उपलब्धि नहीं है। भारत जैसे विशाल देश में आर्थिक हालात ठीक न होने के बावजूद, न्यूनतम राशन सबको मिल पा रहा है, उतनी व्यवस्था सरकार कर पा रही है, यह भी छोटी बात नहीं है, पर इससे यह मान लेना कि बहुत जल्दी भारतीय अर्थव्यवस्था कोविड पूर्व की स्थिति में पहुंच जाएगी, थोड़ी जल्दबाजी होगी।

अप्रैल से जून 2021 के दौरान यानी मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में देश की जीडीपी ग्रोथ रेट 20.1% रही है। यानी पिछले साल की इसी तिमाही-अप्रैल जून 2020 के मुकाबले देश की जीडीपी में 20 फीसदी से ज्यादा का उछाल देखने को मिला है, लेकिन इस उछाल की मुख्य वजह है पिछले साल की इसी अवधि के दौरान दर्ज की गई भारी गिरावट। बहुत गिरे हुए आधार से थोड़ी भी उठान बहुत बड़ी दिखाई पड़ जाती है। अप्रैल-जून 2021 के यह आंकड़े दरअसल रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के अनुमान से भी कम रहे हैं। रिजर्व बैंक ने इस दौरान यानी अप्रैल जून 2021 में जीडीपी में 21.4 फीसदी की ग्रोथ होने का अनुमान जाहिर किया था। जीडीपी के मूल आंकड़ों की तुलना करने से ये बात और भी साफ हो जाएगी। दरअसल, अप्रैल से जून 2021 के दौरान देश की जीडीपी 32.38 लाख करोड़ रुपये रही, जो अप्रैल-जून 2020 के 26.95 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले 20.1 फीसदी अधिक है, लेकिन दो साल पहले यानी अप्रैल-जून 2019 में देश की जीडीपी 35.66 लाख करोड़ रुपये थी, इससे तुलना करें तो मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही की जीडीपी दो साल पहले के मुकाबले अब भी करीब 10 फीसदी कम है। इससे यह भी पता चलता है कि भारत को कोविड के कारण आई आर्थिक मंदी से बाहर निकलने में अभी और वक्त लगने वाला है। 2019 की स्थिति को अगर कोविड पूर्व की स्थिति माना जाए, तो भी अभी समय लगने वाला है। अप्रैल से जून 2021 के दौरान देश की जीडीपी 32.38 लाख करोड़ रुपये रही, जबकि दो साल पहले यानी अप्रैल से जून 2019 के दौरान यह 35.66 लाख करोड़ रुपये थी। जाहिर है कि 20.1 फीसदी की ग्रोथ के बावजूद हम अब भी 2019 के मुकाबले पीछे चल रहे हैं। इससे यह भी पता चलता है कि भारत को कोविड के कारण आई आर्थिक मंदी से बाहर निकलने में अभी और वक्त लगने वाला है, और इंतजार अभी थोड़ा और लंबा है लेकिन राहत की बात यही है कि अर्थव्यवस्था अब रिकवरी के रास्ते पर आगे बढ़ने लगी है।

देश की आर्थिक विकास को रफ्तार देने में सबसे ज्यादा योगदान देने वाले प्राइवेट फाइनल कंजप्शन एक्सपेंडिचर(पीएफसीई) यानी आम लोगों द्वारा उपभोग पर खर्च की जाने वाली रकम अप्रैल-जून 2021 के दौरान करीब 17.84 लाख करोड़ रुपये रही, जो पिछले साल के 14.95 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले अधिक है, लेकिन दो साल पहले की इसी अवधि के मुकाबले यह रकम अब भी काफी कम है। अप्रैल-जून 2019 के दौरान देश में पीएफसीई के तहत आम लोगों द्वारा खर्च की गई रकम 20.24 लाख करोड़ रुपये रही थी। इससे जाहिर होता है कि देश में आम उपभोक्ताओं की कंज्यूमर डिमांड अब भी दो साल पहले के स्तर को नहीं छू पाई है। खरीदारी में संकोच है, आय में संकुचन है। यह बात आईने की तरह साफ है, हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि आर्थिक हालात में सुधार नहीं है। स्थितियां सुधर रही हैं, पर एक साल से ज्यादा की आर्थिक तबाही की रिकवरी चार छह महीनों में संभवना है। तीसरी लहर की आशंकाएं चल रही हैं और इसलिए भी आम जनमानस पूरे तौर पर आश्वस्त नहीं है, क्या पता दूसरी लहर वाला हाल हो गया और बीमारी लंबी खिंच गई, नौकरियां चली गईं, इलाज का भारी खर्च आ गया तो। इस तरह की आशंकाओं ने अभी भी आम जनमानस को त्रस्त कर रखा है, इसलिए वह खुलकर खर्च करने का मन नहीं बना पा रहा है। निजी उपभोग में तेजी तब आएगी, जब सरकार आधिकारिक तौर पर घोषणा कर दे कि टीकाकरण या दूसरी वजहों से अब कोरोना वैसा नुकसान नहीं कर पाएगा, जैसा कुछ समय पहले आशंकित था, इसलिए जरूरी है कि कोविड टीकाकरण की रफ्तार में सतत तेजी रहे। निश्चित तौर पर अर्थव्यवस्था अब उबर गई है पर अभी उछलने में थोड़ा वक्त लगने वाला है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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