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एडवोकेट रघुबीर सिंह दहिया का लेख: 27 जून है महान शिक्षक की महान शिष्या हेलेन केलर को याद करने का दिन

Helen Keller में ये विशेषता थी कि वो एक बार जिसके चेहरे पर हाथ फेरकर उसकी पहचान कर लेती थी तो पूरे जीवन उसको नहीं भूलती थी। महारानी विक्टोरिया उन्हें अद्भुत प्रतिभा कहा करती थी। ट्रमैन, मार्क ट्वेन, बर्नार्ड शा, आइंसटीन, रवींद्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी, जवारलाल नेहरू जैसे व्यक्तियों से भी उसकी मुलाकात हुई थी।

एडवोकेट रघुबीर सिंह दहिया का लेख: 27 जून है महान शिक्षक की महान शिष्या हेलेन केलर को याद करने का दिन
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Helen Keler

मानव समाज और प्रकृति के प्रति उच्च आदर्श कितना महान और उत्कृष्ट हो सकता है इसका प्रत्यक्ष वर्णन हेलेन केलर के जीवन चरित्र से उजागर हो जाता है। दर्द की पीडा का बोझ आंख नहीं देख सकी और कान आह न सुन सके। जुबान हिली नहीं और दर्द खंजर की तरह अबोध बच्ची के सीने में उतरकर चुभने लगा। गूंगी, बहरी और अंधी हेलेन केलर बेचैन हाेकर छटपटा रही थी। उसके सुंदर दिन शुरू होते ही अंधकार में बदल चुके थे। असहनीय दर्द और पीडा से रोती हेलेन के लिए मां का प्यार भी राहत नहीं दे पा रहा था। ऐसे में 20 साल एक महान शिक्षक मिस ऐनी सुलीवन ने बच्ची के दिल के जख्म को समझा और उसकी प्रतिभा को ढूंढकर दुनिया के सामने लाने की ठान ली। गुरु मिस सुलीवन ने प्रिय शिष्य हेलेन केलर के जीवन के लिए अपने सुंदर जीवन को भी न्यौछावर कर दिया। आज 140 साल बाद भी प्रबुद्ध दुनिया उस अंध बधिर संसार की मसीहा हेलेन केलर को पूरे आदर और सम्मान के साथ उनकी जयंती पर याद कर रही है, जिसने लेनिन को भी मानवता के लिए नव जीवन के बीज बोने वाला बताया।

हेलेन केलर का जन्म 27 जून 1880 को अमेरिका के अलाबामा के तुस्कुबिया में एक संपन्न परिवार में हुआ था। उनकी मां का नाम केट एडम्स केलर और पिता का नाम आर्थर हेनले केलर था। जब वह छह महीने की थी तो जबान से हाउ दोए बोले और इसके बाद टीटीटी के शब्द निकाले। एक साल की हुई तो मां की गोद से उतरकर दौडने लगी और बात करने लगी लेकिन ये सुंदर दिन बहुत ज्यादा दिन नहीं चले। जब वह 19 महीने की हुई तो एक लाइलाज बीमारी ने घेर लिया। हेलेन की देखने और सुनने की शक्ति खत्म हो गई और देखते ही देखते बोलने की शक्ति भी चली गई। डॉक्टरों ने बताया कि पेट और दिमाग में जकडन होने से भी बचना करीबन मुश्किल है। परिवार पर ये सुनकर दुखों का पहाड टूट पडा। 25 साल की मां के प्यार और कोमलता ने हेलने को सहलाया भी लेकिन राहत नहीं मिली। अंधकार ही अंधकार में बच्ची मां से चिपकी रहती। धीरे-धीरे उस खामोशी और अंधेरे किे साथ अनुकूलन होता गया और जो कुछ पहले सीखा था विस्मृति के गृत में जा रहा था। हेलने की मां कैट ने कहीं पढा कि लारा ब्रिजमन एक अंधी और बहरी बच्ची थी और उसे शिक्षित किया गया है। हेलेने के पिता ने वाशिंगटन में डॉक्टर लेवजेंडर ग्राहम बेल से बात की और उनकी सलाह से बोस्टन के परकिंस इंस्टीट्यूट के डाॅयरेक्टर मि. ऐनेगनॉश से शिक्षक की मांग की और शिक्षक मिल गई।

3 मार्च 1887 को हेलेन केलर के जीवन में ऐतिहासिक दिन आया। उसकी माहन शिक्षक ऑन मेंसफील्ड सुलीवन उसके घर उसे पढाने आई। मिस सुलीवन की उम्र उस समय बीस साल थी। सुलीवन ने हेलेन की इच्छा और अहसास को समझकर उसी दिन दिन अपने कमरे में ले गई और हेलेन को एक गुडिया दी। ये गुडिया लारा ब्रिजमन और परकिंस इंस्टीट्यूट के बच्चों ने भेजा था। कुछ समय तक हेलने गुडिया के साथ खेलती रही और फिर मिस सुलीवन ने अपनी शिष्य हेलेन के हाथ पर धीरे-धीरे डी ओ आई आई लिखा। उंगलियों के इस खेल में हेलेन की दिलचस्पी बन गई और इस पर स्वयं हेलेन ने बाद में लिखा कि मेरी शिक्षक ने मेरी आत्मा को मुक्त कर दिया था। उन्होंने समझाया कि हर वस्तु का एक नाम होता है। नल के नीचे हेलेन का हाथ रखकर गिरते पानी का असहास करवा सुलीवन ने हथेली पर उंगलियों से डब्ल्यू ए टी ई आर लिखा। इस तरह हेलेन में नई चेतना जागृत होने लगी। वह रोज नए नए शब्द सीख रही थी। हेलने ने लिखा कि उसकी प्रतिभा, हर खुशी, हर अहसास, हर इच्छा और समस्त ज्ञान में उसकी महान शिक्षक मिस सुलीवन का प्यार भरा स्पृश सदा मौजूद रहता था।

हेलने कही कहीं कक्षा चलती ओर अपनी शिक्षक की मदद से जिज्ञाशाएं शांत कर लेती। अंक गणित में रुचि नहीं होने के बाद भी उसने जोडना घटाना सीख लिया। एक वर्ष की घर पर शिक्षा के बाद हेलेन बोस्टन में आ गई। नेत्रहीनों की संस्था परकिंस में हेलेन की औपचारिक शिक्षा शुरू हुई। अपनी शिक्षक की सहायता से उसने दस साल की आयु में बोलना सीख लिया। एक दिन कोशिश करते करते वो वाटर बोलना भी सीख गई। हेलेन को पूरी आशा थी कि एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब वह दूसरों की तरह बोलने लगेगी और एक दिन उसने इज इट वार्म बोल दिया। मिस सुलीवन खुशी से फूली नहीं समाई और उसे प्रिंसिपल सारा फुलर के पास लेकर गई। फुलर ने हेलेन की जिह्वा हिलाकर उसे आइ्र का सही उच्चारण करना सिखाया और फिर आई एम नाट डंप नाऊ पूरे आत्मविश्वास के साथ बोला तो ये सबके लिए चमत्कार से कम नहीं था।

16 साल की उम्र में वह कैंब्रिज स्कूल में दाखिल हुई तो उसकी शिक्षक मिस सुलीवन भी उसके साथ ही बैठती। हेलेन ने फ्रेंच, जर्मन, इंग्लिश और लैटिन भाषा पर अच्छा अधिकार प्राप्त कर लिया। 29 अगस्त 1896 के दिन हेलेने के पिता की मृत्यु हो गई पर मां कैट ने बेटी को संभाल लिया। हेलेन विख्यात हार्वर्ड की प्रवेश परीक्षा में पास हो गई और उसे लडकियों के रेडक्लिफ कॉलेज में प्रवेश मिल गया। उसने वहां अग्रेजी साहित्य के साथ जर्मन और फ्रेंच भी पढी। शेक्सपीयर, एडीशन, किट्स, वर्डसवर्थ आदि हेलेन के लिए खजाने की तरह थे। जब वह उन पर अपनी उंगलियों की सहायता से पाठ तैयार करती तो उसे महान स्वतंत्रता का अहसास होता। मिस सुलीवन हमेशा की तरह उसका साया बनकर साथ रहती। वह न केवल उसकी हथेली पर लिखती बल्कि उसके शब्दों को शुद्ध भी करती। हेलेन ने दर्शन पढा, सुकरात, प्लेटो, कांट, तोल्सतोय और कार्ल मार्क्स को भी पढकर काॅलेज में विचार विमर्श किया था। उसकी कार्ल मार्क्स के साम्यवाद में महानता दिखाई दी। 1904 में हेलेन ने यूनिवर्सिटी की सभी परीक्षाओं में सफलता मिली और अंग्रेजी साहित्य में विशेष सम्मान के साथ डिग्री प्रदान की गई तो सफलता का श्रेय अपनी महान शिक्षक सुलीवन को दिया।

1905 में हेलेन ने शिक्षक मिस सुलीवन के जॉन मेसी से विवाह के अवसर पर कहा, उन्होंने अपने सबसे सुंदर वर्ष मुझपर कुर्बान कर दिए। मैं हमेशा चाहती थी कि उनको किसी नेक इंसान का प्यार मिले। उनके विवाह के मौके पर मुझे आनंद व अपार खुशी मिल रही है। डॉ. बेल ने हमारे फार्म हाउस पर विवाह संपन्न करवाया। मैं अपनी महान शिक्षक के ठीक बगल में खडी थी। मेरी बहन जो हरा था, उसे मेरी हथेली पर लिखकर बता रही थी। मेरी मां परिवार के सदस्य और निकट के दोस्त विवाह में उपस्थित थे। दंपति हनीमून के लिए न्यू आर्लियंस चले गए और मैं भी अपने मां के साथ कुछ दिन घूमने चली गई।

अपनी शिक्षक मिस सुलीवन की निष्ठा, समर्पण और बलिदान से प्रभावित होकर हेलेन ने भी समाजसेवा के महान उद्देश्य को पर अपने कदम बढा दिए थे। 1921 में हेलेन ने क्लीयरिंग हाउस स्थापित किया और इसने नेत्रहीनों की मुख्य आवश्यकता को समझा और उसके लिए आवश्यक संसाधन जुटाने की मुहिम शुरू की गई। इसी दौरान 15 नवंबर 1921 को हेलेन की मां कैट का भी देहांत हो गई और उसे इसकी गहरी चोट लगी। इस दौर में भी उसकी शिक्षक सुलीवन और उसके पति जॉन मेसी ने हौसला और साहस बढाने में कोई कसर नहीं छोडी। मां की मौत ने उसके जीवन में अपार शून्य छोड दिया था और वह जीवनभर उन्हें याद करते हुए नेत्रहीनों के लिए लगातार एक बेहतर व सुंदर दुनिया के सपने के लिए काम करने लगी। वह अपने व्याख्यानों में कहा करती, नेत्रहीनों की भूख को तृप् करने के लिए रोटी के साथ-साथ किताब दी जाए। जिसे वे पढकर अपने विवके से दुनिया की सुंदरता को देख सकें।

अमेरिकन फाउंडेशन फार द ब्लाइंड के लिए हेलेन व उसकी शिक्षक सुलीवन ने अनथक काम किया। सारे देश में बैठकों व विचार विमर्श के माध्यम से लाखों लोगों के सामने अपनी बात रखी और नेत्रहीनता रोकने के लिए लाखों डाॅलर का फंड भी इक्टठा किया। वे निरंत पत्र पत्रिकाओं में लिखती थी और उससे प्राप्त धन को अंध-मूक-बधिर कल्याण कार्यों में लगा देती थी। हेलेन के कार्यों से प्रभावित होकर लोगों ने इतना फंड दिया कि गिनना मुश्किल हो गया था। बच्चे तक हेलेन की गोद में अपना गुल्लक खाली कर दिया करते थे। 20 अक्टूबर 1926 को हेलेन की महान शिक्षक सुलीवन हमेशा के लिए प्रकृति की गोद में सो गई। हेलेन ने इसे अपने जीवन की सबसे बडी क्षति बताया था।

1946 में हेलेन केलर को अमेरिकन फाउंडेशन आफ ओवरशीज ब्लाइंड का काउंसलर नियुक्त किया गया। हेलेन केलर ने 1957 तक लगभग 40 देशों की यात्राएं की और पूरी दुनिया के नेत्रहीनों को हिम्मत और साहस का उजाला मिला। 1955 के फरवरी माह में वे भारत पाकिस्तान, म्यंमार, फिलपींस और जापान भी गई। जापान में उसके अभियान में 3 करोड 50 लाख डॉलर की मदद हुई और उसने वह पूरी राशि जापान के नेत्रहीनों के कल्याण के लिए दे दी। अपने जीवन पर आधारित फिल्म माइरेकल में उन्होंने स्वयं काम किया था। उन्होंने नेत्रहीन इंसान संगीतज्ञ और प्रशासक बने। हेलेन का पूरा जीवन दूसराें को प्रेरणा देने में बीता। हेलेन में ये विशेषता थी कि वो एक बार जिसके चेहरे पर हाथ फेरकर उसकी पहचान कर लेती थी तो पूरे जीवन उसको नहीं भूलती थी। महारानी विक्टोरिया उन्हें अद्भुत प्रतिभा कहा करती थी। ट्रमैन, मार्क ट्वेन, बर्नार्ड शा, आइंसटीन, रवींद्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी, जवारलाल नेहरू जैसे व्यक्तियों से भी उसकी मुलाकात हुई थी। किसी ने पूछा कि अंधा होने से भी कुछ बुरा है क्या? तो हेलेन ने कहा था उद्धेश्यहीन जीवन और इंसानियत का मर जाना अंधा होने से बुरा है। जून 1968 में वो महान शिक्षक सुलीवन की शिष्या हेलेन केलन ह्रदय गति रूक जाने के लिए हमेशा के लिए प्रकृति की गोद में सो गई लेकिन उनके काम उन्हें सदियों तक हमारे बीच रखेंगे।

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