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विवेक शुक्ला का लेख : वात्सयायन से वंचित हुआ देश

पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी और फिर अमेरिका से पढ़ी कपिला की प्रतिभा को सबसे पहले देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद ने पहचाना। भारत के सामने 1947 के बाद अपनी सांस्कृतिक विरासत को उसका सही स्थान देने की चुनौती थी। उस दौर में मौलाना आजाद ने कपिला को अपने साथ जोड़ा

विवेक शुक्ला का लेख : वात्सयायन से वंचित हुआ देश
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कलाविद् डा. कपिला वात्स्यायन (फाइल फोटो)

विवेक शुक्ला

अगर कोविड-19 के कारण स्कूल बंद न होते तो जामा मस्जिद के ठीक पीछे इन्द्रप्रस्थ हिन्दू कन्या विद्यालय में कलाविद् डा. कपिला वात्स्यायन की स्मृति में छात्राओं ने मौन अवश्य रखा होता। कपिला जी ने दिल्ली के इस पहले कन्या विद्यालय से स्कूली शिक्षा ग्रहण की थी। वो तब कपिला मलिक थीं। वरिष्ठ लेखक और संपादक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय से विवाह के बाद वह वात्स्यायन हो गई थी। उनका बुधवार को निधन हो गया। वह 92 साल की थीं।

कपिला वात्स्यायन भारतीय शास्त्रिय संगीत, नृत्य, कला, वास्तुकला की उदभट विद्वान थीं। कपिला ने अपने जीवनकाल में जितने सांस्कृतिक केन्द्र स्थापित किए उतने अन्य किसी ने नहीं किए। पूर्व केन्द्रीय संस्कृति सचिव जवाहर सरकार कहते हैं कि आजाद भारत की सांस्कृतिक नीति बनाने में कमलादेवी, पुपुल जयकर और कपिला ने अविस्मरणीय योगदान दिया। देश इन तीनों का सदैव कृतज्ञ रहेगा।

पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी और फिर अमेरिका से पढ़ी कपिला की प्रतिभा को सबसे पहले देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद ने पहचाना। भारत के सामने 1947 के बाद अपनी सांस्कृतिक विरासत को उसका सही स्थान देने की चुनौती थी। उस दौर में मौलाना आजाद ने कपिला को अपने साथ जोड़ा। ये बात 1956 की है। मौलाना आजाद ने देश में संग्रहालयों को लेकर व्यापक नीति बनाने के लिए बैठक बुलाई। उसमें, उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि ब्रिटिश काल के दौरान देश की बहुत सी बहुमूल्य धरोहरें देश से बाहर चली गईं। उन्हें वापस लाने के प्रयास करने होंगे। इसके साथ ही नए संग्रहालयों के निर्माण पर फोकस रखना होगा। उस बैठक में डॉ. कपिला वात्स्यायन भी उपस्थित थीं।

मौलाना आजाद ने उन्हें बैठक के मिन्ट्स बनाने की जिम्मेदारी दी। कपिला जी ने अपने नोट्स का श्रीगणेश यह कहते हुए किया कि भारत के संग्रहालय अपने आप में श्रेष्ठ हैं। इनमें देश की कला-संस्कृति का खजाना पड़ा हुआ है। पर इनकी स्थिति किसी जंक हाउस (कबाड़ घर) जैसी हो गई है। इनका कायाकल्प करने के लिए बेहतर प्रसूचीकरण तथा डाक्यमेन्टेशन करना जरूरी है। उन्होंने ये संस्मरण अपनी जीवनी एफ्लोट आन ए लोट्स लीफ में सांझा किए हैं।

कपिला के नोट से मौलाना आजाद प्रभावित हुए पर पूछा कि ये जंक हाउस क्या होता? जाहिर है, मौलाना आजाद की बुलंद शख्सियत के सामने वह जवाब देने की स्थिति में नहीं थी। तब मौलाना ने उनसे कहा, अमेरिका पढ़कर आई है ना, अपने नोट्स में अमेरिकन इंग्लिश मत लिखो। ये बात कम लोगों को पता है कि डा. कपिला वात्स्यायन की सलाह और सिफारिश पर नेहरू मेमोरियल म्युजियम और लाइब्रेयरी स्थापित किए गए थे। सरकार ने एक बार कपिला के प्रस्ताव को माना तो फिर उन्होंने उसे मूर्त रूप दिया। नेहरू नेहरू मेमोरियल म्युजियम और लाइब्रेयरी के वास्तुकार राणा मान सिंह को कपिला जी लगातार इसके डिजाइन को लेकर सलाह दिया करती थीं। उनका वास्तुकला और मूर्तिकला पर भी गहन अध्ययन था। कथक गुरू राम मोहन महाराज तो कपिला जी की मृत्यु का समाचार सुनकर भावक होकर कहने लगे वह मेरी गुरू बहन थीं। उनको भी मेरे पिता शंभू महाराज ने कथक सिखाया था। कपिला जी को भारतीय संगीत की विभिन्न धाराओं के सिद्ताओं, उत्पति, विकास आदि की गहन जानकारी थी।

राज्य सभा की सदस्य रहीं कपिला वात्स्यायन का सरकारी आवास डी1-60 चाणक्यपुरी लंबे समय तक कलाधर्मियों और विद्वानों का सबसे पसंदीदा स्थान रहा। वह जब 1980 के दशक के मध्य में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र स्थापना कर रही थी तब उनके इसी आवास में आईजीएनसीए को लेकर भावी योजनाएं बनती थीं। उन्होंने इससे चीनी विद्वान डा. तान चुंग और डा. मनीषचंद्र जोशी जैसे दिग्गज पुरातत्ववेत्ता को जोड़ा। डा.कपिला वात्स्यायन के अवसान से देश, दिल्ली और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर ने अपना एक सांस्कृतिक संरक्षक खो दिया है। वह आईआईसी में लगातार अध्ययन करती हुई मिल जाया करती थीं। अब आईआईसी में आने वाले उनकी गरिमामयी उपस्थिति के आलोक से वंचित ही रहेंगे।

(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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