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एक साल बाद हम कितना सबक ले पाए निर्भया कांड से

देश को हिला देने वाली वसंत विहार गैंगरेप की घटना को हुए एक साल हो गया हैं।

एक साल बाद हम कितना सबक ले पाए निर्भया कांड से

नई दिल्ली. हर देश और काल में कभी-कभी ऐसी घटनाएं घटती हैं, जो समाज को अंदर तक झकझोर देती हैं, उसे अति का अहसास दिलाती हैं। लोगों की सोईहुई चेतना को जगाते हुए उन्हें अपने अधिकारों की रक्षा के लिए उठ खड़े होने को विवश करती हैं और देश तथा समाज उसकी नृशंसता की इंतहा से द्रवित होकर बरबस कह उठता है, बस अब बहुत हुआ इससे आगे नहीं। एक साल पूर्व 16 दिसंबर, 2012 को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सड़कों पर आधी रात को ‘निर्भया’ के साथ सामूहिक दुष्कर्म की बर्बरता ऐसी ही एक घटना थी। इसके बाद तो जैसे पूरा देश उबल उठा था। दिल्ली का राजपथ कईदिनों तक युवाओं से अटा पड़ा रहा। उनके गुस्से को देखते हुए लोकतंत्र, कानून और संविधान की सर्वोच्च प्रहरी संसद, पुलिस-प्रशासन और सुप्रीम कोर्ट को आगे आना पड़ा।

महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्यों में हेल्पलाइन नंबर जारी किये गए। थानों में अलग से महिला पुलिस की तैनाती ही नहीं, बल्कि अलग महिला थानों के गठन की बात भी कही गई। यौन उत्पीड़न जैसे मामलों की सुनवाई के लिए त्वरित न्यायालयों के गठन की योजना बनी। साथ ही महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए वर्मा आयोग का गठन किया गया, जिसने तीन माह में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी। उसके आधार पर संसद ने बलात्कार के खिलाफकड़ा कानून बनाया। वित्त मंत्री ने बजट में एक हजार करोड़ के निर्भया फंड की घोषण की, जिसे यौन हिंसा पीड़ित महिलाओं के उपयोग में लाया जाना था।

देश भर से उठी आवाज और सरकारी सक्रियता को देखते हुए एक उम्मीद जगी थी कि समाज महिलाओं के हितों के प्रति संवेदनशील होगा, लेकिन उसके बाद भी जिस तरह से देश में बलात्कार की घटनाएं हो रही हैं, उससे उन तमाम उम्मीदों पर पानी फिर गया है। इसकी एक वजह यह रही है कि तमाम सुधार जिस तेजी से लाए गए थे उस तेजी से लागू नहीं किए जा सके और मामला शांत होने के बाद ठंडे बस्ते में डाल दिए गए। यह अफसोस जनक हैं कि इतना कुछ होने के बाद भी निम्न वर्ग से लेकर समाज के उच्च वर्ग में महिलाओं के प्रति पुरुषवादी मानसिकता में कोई बदलाव देखने को नहीं मिल रहा है।

निर्भया कांड के दोषियों (एक नाबालिगको छोड़कर) को फांसी की सजा हुई है, फिर भी लोगों में कानून का भय दूर-दूर तक नहीं दिख रहा। आंकड़ों के अनुसार अकेले दिल्ली में पिछले साल के मुकाबले अब तक बलात्कार के मामलों में लगभग दोगुनी और छेड़छाड़ के मामलों में तिगुनी बढ़ोतरी हुई है। बाकी राज्यों में स्थिति का सहज ही अनुमान लगा सकते हैं। हाल ही में ‘तहलका’ के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल पर महिला साथी पत्रकार पर यौन हमला करने और सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त एक जज पर एक लॉ इंटर्न के यौन शोषण का आरोप लगा।

वहीं इन दिनों कईधार्मिक गुरुओं और जनप्रतिनिधियों सहित उच्च अधिकारियों पर भी बलात्कार के गंभीर आरोप लगे हैं। देश में पांच साल की मासूम गुड़िया हो या 23 वर्षीय मुंबई की फोटोजर्नलिस्ट जैसी हजारों लड़कियों के साथ हर रोज जिस तरह से दुष्कर्म और छेड़छाड़ की घटनाएं सामने आ रहीं वह एक सभ्य समाज की तस्वीर पेश नहीं करतीं। 16 दिसंबर की घटना के बाद कहीं कुछ बदला है ऐसा कुछ दिख नहीं रहा। पर आखिर क्यों? यह ऐसा सवाल है जो हमें अंदर तक कुरेद रहा है। इस पर सभी को एकजुट हो कर गंभीर चिंतन की जरूरत है।

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