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राहुल गांधी ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं दी ये नसीहत, लोकसभा चुनाव के लिए बनाई ये रणनीति

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि पार्टी में अभी जो भी आपसी लड़ाई है लोकसभा चुनाव बाद लड़ेंगे, पहले पार्टी के लिए काम करेंगे। हमारे कार्यकर्ता और वरिष्ठ नेता बैठे हैं, उनमें ऊर्जा है, देश को बदलने की शक्ति है, लेकिन उनके और नेताओं के बीच में एक दीवार खड़ी है। मेरा पहला काम उस दीवार को तोडऩे का है। गुस्से से नहीं प्यार से।

राहुल गांधी ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं दी ये नसीहत, लोकसभा चुनाव के लिए बनाई ये रणनीति

कांग्रेस के 84वें अधिवेशन में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी का जो नया अवतार नजर आया वह जरूर पार्टी को मजबूत बनाने में मुख्य भूमिका निभा सकता है और इसके लिए उन्होंने जो कार्यकर्ताओं और नेताओं को प्रेम के जरिये पार्टी हित का पाठ पढ़ाया उससे वरिष्ठ नेता भी कहीं न कहीं खुश होंगे। 17- 18 मार्च को दिल्ली में हुए इस अधिवेशन में राहुल गांधी ने कहा था कि पीछे जो हमारे कार्यकर्ता बैठे हैं, उनमें ऊर्जा है, देश को बदलने की शक्ति है, लेकिन उनके और नेताओं के बीच में एक दीवार खड़ी है। मेरा पहला काम उस दीवार को तोडऩे का है। गुस्से से नहीं प्यार से।

2019 लोकसभा चुनाव

राहुल के इस बयान को कांग्रेस पार्टी के सीनियर नेताओं के लिए संकेत माना जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि पार्टी में अभी जो भी आपसी लड़ाई है चुनाव बाद लड़ेंगे, पहले पार्टी के लिए काम करेंगे। 2019 लोकसभा चुनाव को देखते हुए राहुल गांधी का यह भाषण काफी अहम माना जा रहा है। देखना दिलचस्प होगा कि पिछली बार की तरह राहुल के आक्रामक तेवर सिर्फ भाषण तक ही सीमित रहते हैं या फिर उसका पार्टी के संगठन पर भी असर दिखता है।

राहुल गांधी का पीएम मोदी पर वार

राहुल गांधी ने जिस तरह से सधे अंदाज में बीजेपी शीर्ष नेतृत्व पर हमले बोले, उससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या राहुल गांधी वास्तव में 2019 के लिहाज से पीएम मोदी को ललकारने की स्थिति में पहुंच गए हैं? क्या अध्यक्ष पद संभालने के बाद उनमें आत्मविश्वास आ गया है? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर वार करते हुए कहा कि मोदी नाम भ्रष्ट कारोबारी और भारत के प्रधानमंत्री के बीच सांठ-गांठ का प्रतीक है।

कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी अब नंबर वन पर

उन्होंने अमित शाह को हत्या का आरोपी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर न्यायपालिका, संसद और पुलिस पर नियंत्रण करने की कोशिश करने का आरोप लगाया। ये सही है कि राहुल गांधी ने अपने भाषण में बीजेपी के विकल्प के तौर पर पार्टी और नेता के रूप में उम्मीद जगाई है। लेकिन अभी भी उनकी गति में निश्चितता नहीं दिखती। 132 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी अब नंबर वन की हैसियत पा चुके हैं। राहुल गांधी ने ऐसे समय में पार्टी अध्यक्ष बनना स्वीकार किया है जब उनके पास यह पद स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प भी शेष नहीं रह गया था।

राहुल ने बीजेपी को कौरव और कांग्रेस पार्टी को पांडव की संज्ञा दी

सोनिया गांधी ने जिस तरह गुजरात विधानसभा चुनावों से अपने को पूरी तरह अलग रखा उससे यह संकेत तो मिलता ही है कि वे राहुल गांधी को ही गुजरात चुनावों में पार्टी की सफलता का पूरा श्रेय देने की इच्छुक थीं। अब यह उत्सुकता का विषय है कि कर्नाटक, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान के चुनाव राहुल के लिये अग्नि परीक्षा से कम नहीं है। राहुल ने अपने संबोधन के दौरान महाभारत का जिक्र करते हुए बीजेपी को कौरव और कांग्रेस पार्टी को पांडव की संज्ञा दी। इसके साथ ही अपनी पार्टी के नेताओं को भी नसीहत की घुट्टी पिलाते हुए पार्टी में बड़े बदलाव की बात कही।

ओल्ड गार्ड बनाम युवा तर्क

इस तरह के दावे तो वह पहले भी करते आए हैं लेकिन सवाल उठता है कि क्या पुराने नेताओं की जगह नए चेहरों को लाने में उनको परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा। क्या इससे पार्टी में ओल्ड गार्ड बनाम युवा तर्क की महाभारत नहीं छिड़ेगी? ऐसा इसलिए क्योंकि इन दावों के बावजूद अभी तक पार्टी की पुरानी परिपाटी को तोड़ा नहीं जा सका है। इसकी बानगी इस बात से समझी जा सकती है कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में अगले कुछ महीनों में ही चुनाव होने वाले हैं लेकिन वहां पुराने चेहरों की जगह ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट को पार्टी का चेहरा अभी तक घोषित नहीं किया जा सका है।

आरएसएस का संविधान

राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस देश के संविधान की इज्जत करती है और संघ देश के संविधान को खत्म करके केवल एक ही संविधान लागू करना चाहता है और वह है आरएसएस का संविधान। मीडिया कांग्रेस के बारे में खूब उल्टा-सीधा लिखती है फिर भी कांग्रेस हमेशा मीडिया की रक्षा और अधिकारों के लिए उनके साथ है और रहेगी। कांग्रेस के नेताओं से जब कोई गलती होती है, तो वे सभी के सामने अपनी गलती स्वीकार करते हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी ने देश को बर्बाद कर दिया, फिर भी वे अपनी गलती मानने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने कहा कि विदेश नीति पर केंद्र पूरी तरह विफल साबित रहा है।

चीन पाकिस्तान पर मौन भारत

पाकिस्तान लगातार संघर्ष विराम का उल्लंघन कर रहा है, तिब्बत, मालदीव और डोकलाम में चीन की मौजूदगी चिंताजनक है। राहुल गांधी को कांग्रेसाध्यक्ष के रूप में पार्टी के उन बुजुर्ग नेताओं को संतुष्ट करना होगा जो नए अध्यक्ष के साथ काम करने में झिझक महसूस कर सकते है। गांधी को दरअसल पार्टी अध्यक्ष के रूप में अब यह तय करना है कि पार्टी के वरिष्ठ अनुभवी बुजुर्ग नेताओं के अनुभव का लाभ किस तरह लिया जाए और युवा कार्यकर्ताओं एवं नेताओं को अग्रिम मोर्चे पर किस तरह महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी जाएं। राहुल गांधी ने अभी तक जो भी फैसले किए है उन्हें देखकर यही निष्कर्ष निकला जा सकता है कि वे कड़े फैसले लेने का साहस प्रदर्शित करने से नहीं हिचकेंगे।

कांग्रेस का लोकतंत्र

महाधिवेशन के समापन भाषण के दौरान राहुल गांधी ने पार्टी के अंदर लोकतंत्र लाने की बात भी कही और अधिक से अधिक संख्या में कार्यकर्ताओं को मौका देने की वकालत की, लेकिन अधिवेशन के कुछ ही देर बाद ही कांग्रेस पार्टी के अंदर वर्षों से जारी पुरानी परिपाटी को ही अपनाया गया, राहुल को कार्यसमिति के सदस्यों को मनोनीत करने का पूरा अधिकार दे दिया गया। उन्होंने भी इसका विरोध नहीं किया और अपने पसंद के 24 लोगों को उन्होंने नॉमिनेट करना पसंद किया।

लोकसभा में सिमटी कांग्रेस

हो सकता है कि पार्टी के एक वर्ग को राहुल गांधी के इन कड़े फैसलों से कोई लाभ मिलने की उम्मीद न हो परंतु राहुल गांधी के सामने अब इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं है कि पार्टी का कायाकल्प करने के लिए कड़े फैसले लेने से परहेज न किया जाए। पार्टी आज जिस संकट के दौर से गुजर रही है वह दरअसल पहचान का संकट ही है। अधिकांश राज्यों में वह सत्ता से बेदखल हो चुकी है। केन्द्र में एक दशक तक सत्ताधारी गठबंधन का नेतृत्व करने वाली पार्टी आज लोकसभा में मात्र 44 सीटों पर सिमट चुकी है और सबसे बड़ी विपक्ष पार्टी होने के बावजूद लोकसभा में विपक्ष के नेता पद के लिए दावा करने की हैसियत अर्जित करने में असफल रही।

कांग्रेस में सोनिया राज

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के कार्यकाल में पार्टी को केन्द्र में एक दशक तक सत्ताधारी गठबंधन का नेतृत्व करने का सौंभाग्य मिला और 20 राज्यों में सत्ता में रही। आज स्थित बिल्कुल विपरीत है। केन्द्र में और उन राज्यों में जहां वह सत्ता से बेदखल हो चुकी है। पार्टी की सत्ता में वापिसी की उम्मीदें तो दूर की बात है वह सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाने में भी समर्थ नहीं है। अगले साल जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने है वहां पार्टी के संगठन में इतना बिखराव हो चुका है कि उसे एक साल के अंदर एकजुट कर पाना टेढ़ी खीर प्रतीत होता है।

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