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बजट 2017: जीएसटी से भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव और नए इनकम टैक्स स्लैब की कहानी

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने जहां नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली राजग सरकार के कामकाज, नीतियों, कार्यक्रमों और उपलब्धियों का जिक्र किया, वहीं बजट सत्र के पहले दिन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आर्थिक सर्वे पेश करते हुए जानकारी दी कि देश की आर्थिक सेहत दुरुस्त है और सही दिशा में बढ़ रही है।

बजट 2017: जीएसटी से भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव और नए इनकम टैक्स स्लैब की कहानी

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के अभिभाषण के साथ सोमवार को बजट सत्र की शुरुआत हो गई है। राष्ट्रपति ने जहां नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली राजग सरकार के कामकाज, नीतियों, कार्यक्रमों और उपलब्धियों का जिक्र किया, वहीं बजट सत्र के पहले दिन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आर्थिक सर्वे पेश करते हुए जानकारी दी कि देश की आर्थिक सेहत दुरुस्त है और सही दिशा में बढ़ रही है।

कुछ क्षेत्रों को लेकर चिंता जरूर बनी हुई है परंतु जल्दी ही इस तरह की परेशानियों से उबर जाने की उम्मीद है। सर्वे में बेशक निकट भविष्य में महंगाई बढ़ने की आशंका जाहिर की गई है परंतु सर्वविदित है कि जब भी आर्थिक विकास दर ऊपर जाती है, जब महंगाई बढ़ने की सदैव आशंका रहती ही है। खास बात यह है कि आर्थिक सर्वे में यह दावा किया गया है कि अब तक के सबसे बड़े आर्थिक सुधार वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ने भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नया आयाम प्रदान किया है।

इसके नए आंकड़े उभरकर सामने आए हैं। चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है कि इसे लागू किए जाने के बाद अप्रत्यक्ष कर देने वालों की संख्या में 50 प्रतिशत की बढोत्तरी हुई है। जीएसटी में छोटे उद्यमों का भी स्वैच्छिक पंजीकरण बढ़ा है। ऐसा इसलिए क्योंकि वे बड़े उद्यमों से खरीदारी करते हैं और खुद भी इनपुट टैक्स क्रेडिट्स का लाभ उठाना चाहते हैं।

नई कर प्रणाली अपनाने से प्रमुख उत्पादक राज्यों के कर संग्रह में कमी आने की आशंका निराधार साबित हुई है।ऐसा इसलिए क्योंकि राज्यों के बीच जीएसटी आधार के वितरण को उनकी अर्थव्यवस्थाओं के आकार से जोड़ दिया गया है। इसी तरह नवंबर 2016 से लेकर अब तक व्यक्तिगत आयकर रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या भी लगभग 18 लाख बढ़ी है।

भारत का औपचारिक (फॉर्मल सेक्टर) क्षेत्र विशेषकर फॉर्मल नॉन-ऐग्रिकल्चर पे-रोल को मौजूदा अनुमान की तुलना में काफी अधिक पाया गया है। ईपीएफओ और ईएसआई जैसे सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों के पैमाने पर तय से जुड़ा फॉर्मल सेक्टर पे-रोल नॉन-फार्म वर्कफोर्स का लगभग 31 प्रतिशत था लेकिन, जीएसटी के पैमाने पर परिभाषित औपचारिक क्षेत्र संबंधी पे-रोल की हिस्सेदारी 53 प्रतिशत पाई गई।

एक उल्लेखनीय तथ्य यह भी सामने आया है कि भारतीय समाज में बेटे की चाहत काफी तीव्र है। आर्थिक सर्वेक्षण में इस ओर विशेष तौर पर ध्यान दिलाया गया है कि अधिकतर माता-पिता तब तक बच्चों की संख्या बढ़ाते रहते हैं, जब तक कि उनके यहां लड़के पैदा नहीं हो जाते। सर्वेक्षण में बालक-बालिका अनुपात के अपेक्षाकृत कम रहने का पता चलता है।

इसके साथ ही भारत और इंडोनेशिया में जन्म लेने वाले बालक-बालिका अनुपात की भी तुलना की गई है। सर्वे में इसका भी उल्लेख है कि भारत में टैक्स डिपार्टमेंट्स ने कई कर विवादों को चुनौती दी है, लेकिन इसमें सफलता की दर कम रही है। यह दर 30 प्रतिशत से कम आंकी गई है। लगभग 66 प्रतिशत लंबित मुकदमे दांव पर लगी केवल 1.8 प्रतिशत रकम से संबंधित हैं। मात्र 0.2 प्रतिशत मुकदमे में ही दांव पर लगी 56 प्रतिशत राशि आती है।

आंकड़े देते हुए आर्थिक सर्वेक्षण में इस ओर ध्यान दिलाया गया है कि बचत में वृद्धि से आर्थिक विकास नहीं हुआ जबकि निवेश में वृद्धि से आर्थिक विकास निश्चित तौर पर हुआ। भारतीय राज्यों और अन्य राज्य सरकारों का प्रत्यक्ष कर संग्रह अन्य दूसरे संघीय देशों की तुलना में बहुत कम पाया गया है। आर्थिक सर्वेक्षण में भारत, ब्राजील और जर्मनी में स्थानीय सरकारों के कुल राजस्व में प्रत्यक्ष कर के अनुपातों की तुलनात्मक तस्वीर पेश की गई है।

भारतीय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन और इस वजह कृषि पैदावार पर हुए व्यापक प्रतिकूल असर को भी रेखांकित किया गया है। तापमान में हुई अत्यधिक बढ़ोतरी के साथ-साथ बारिश में हुई कमी को भी भारतीय नक्शे पर दर्शाया गया है। इसके साथ ही इस तरह के आंकड़ों से कृषि पैदावार में हुए परिवर्तनों को भी ग्राफ में दर्शाया गया है।

इस तरह का असर सिंचित क्षेत्रों की तुलना में गैर-सिंचित क्षेत्रों में दोगुना पाया गया है। कह सकते हैं कि भारत सरकार की तरफ से बजट से ठीक पहले पेश किया गया आर्थिक सर्वे निराश करने के बजाय आर्थिक सेहत उत्तरोत्तर और अच्छी होने की उम्मीद जगाता है।

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