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चिंतन : वायु प्रदूषण के खिलाफ निर्णायक जंग जरूरी

केंद्र व राज्य सरकार के साथ-साथ अदालतें भी इस दिशा में सक्रियता से सोचने लगी हैं।

चिंतन : वायु प्रदूषण के खिलाफ निर्णायक जंग जरूरी
दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर की बदनामी झेल रही दिल्ली को इस जानलेवा समस्या से निकालने के लिए एक साथ कई बड़े कदम उठाने की जरूरत अब महसूस की जाने लगी है। यहां की हवा में जिस मात्रा में जहर घुल गया है वह आपात स्थिति से कम नहीं है। हालांकि यह ठीक है कि केंद्र व राज्य सरकार के साथ-साथ अदालतें भी इस दिशा में सक्रियता से सोचने लगी हैं। गत दिनों हाईकोर्ट द्वारा दिल्ली को गैस चैंबर कहे जाने के बाद शहर में वाहनों की संख्या कम करने के लिए दिल्ली सरकार द्वारा सम-विषम नंबर की गाड़ियां चलाने का फॉर्मूला लाना या फिर राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल का सरकारों को डीजल गाड़ियां न खरीदने का आदेश देना इसी दिशा में उठाया गया कदम है।
अभी सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली में डीजल गाड़ियों का प्रवेश रोका जाए या नहीं इस पर सुनवाई हो रही है। उम्मीद है, वहां से भी कुछ सार्थक परिणाम निकले। दरअसल, पेट्रोल या गैस आधारित गाड़ियों के मुकाबले डीजल गाड़ियां ज्यादा वायु प्रदूषण फैलाती हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि दिल्ली सहित देशभर में वाहनों की संख्या बढ़ रही है। हर रोज दिल्ली की सड़कों पर एक हजार से ज्याद नई कारें आ रही हैं। यहां दोपहिया वाहनों का भी बड़ा बाजार है। इससे न केवल जाम और दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं बल्कि मानव स्वास्थ्य से जुड़ी नई चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। वायु प्रदूषण के कारण सांस संबंधी रोगों के बढ़ने से दिल्ली में ही प्रतिदिन करीब तेइस लोगों की जानें जा रही हैं।
नेचर र्जनल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि वायु प्रदूषण को रोकने के लिए अगर कारगर उपाय नहीं किए गए, तो 2050 तक हर वर्ष करीब 66 लाख लोग अकाल मृत्यु के शिकार हो सकते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि आबादी के लिहाज से सबसे ज्यादा नुकसान भारत का ही होने वाला है। आज दिल्ली ही नहीं भारत के दर्जनभर शहर दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित शहरों की सूची में शामिल हैं। अब तो छोटे शहर और कस्बे भी इस बिगड़ती आबोहवा की चपेट में हैं। इसीलिए समय रहते हमें अपनी जिम्मेदारी समझते हुए सार्थक उपाय करने होंगे। इस संबंध में उद्योगों से लेकर वाहनों तक सभी प्रदूषण बढ़ाने वाली इकाइयों पर ध्यान देना जरूरी है।
दरअसल, बीते कुछ सालों में लोगों की जीवनशैली और आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। लोगों में निजी वाहन की चाहत बढ़ी है। हालाकि, इसका बड़ा कारण हमारे सार्वजनिक परिवहन का कमजोर होना भी है पर इस बदलती जीवनशैली ने इस चाहत को और बल दिया है, जिसके चलते वाहनों की बिक्री बढ़ी है।
जाहिर है, वाहनों की संख्या को नियंत्रित करने और वायु प्रदूषण को रोकने के लिए कार पूलिंग जैसे साझा यातायात को बढ़ावा देना, निजी वाहनों के प्रयोग में कमी लाने के लिए जन जागरूकता बढ़ाया जाना और प्रदूषण नियंत्रक कानूनों को कठोरता से लागू किया जाना आवश्यक है। साथ ही सार्वजनिक यातायात सुविधाओं को दुरुस्त किया जाना चाहिए ताकि आमजान उनका उपयोग करने में हिचक महसूस न करें। आज जिस तरह स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं, हम अभी भी चेत जाएं तो अच्छा होगा।
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