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एनालिसिस / भारत जापान के संबंध और उसमें एक जापान हमारा भी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आगामी 28-29 अक्तूबर को शुरू हो रही दो दिवसीय जापान यात्रा पर दिल्ली-एनसीआर में बसी हुई जापानी बिरादरी की भी निगाहें हैं। दोनों देशों के संबंध क्रमश: प्रगाढ़ होते जा रहे हैं। कभी बौद्ध और गांधी का देश होने के चलते जापानी भारत आते थे और यहां आकर आनंद का अनुभव करते थे।

एनालिसिस / भारत जापान के संबंध और उसमें एक जापान हमारा भी
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आगामी 28-29 अक्तूबर को शुरू हो रही दो दिवसीय जापान यात्रा पर दिल्ली-एनसीआर में बसी हुई जापानी बिरादरी की भी निगाहें हैं। दोनों देशों के संबंध क्रमश: प्रगाढ़ होते जा रहे हैं। कभी बौद्ध और गांधी का देश होने के चलते जापानी भारत आते थे और यहां आकर आनंद का अनुभव करते थे।

अब वे अनेक जापानी कंपनियों में पेशेवर के रूप में भारत में आते हैं। होंडा सिएल कार, होंडा मोटरसाइकिल, मारुति, फुजी फोटो फिल्मस, डेंसो सेल्ज लिमिटेड, डाइकिन श्रीराम एयरकंडशिंनिंग, डेंसो इंडिया लिमिटेड समेत लगभग दो दर्जन कंपनियों के दिल्ली, गुड़गांव, ग्रेटर नोएड़ा और नोएडा में दफ्तर हैं और बड़ी संख्या में जापानी यहां काम करते हैं या फिर काम के सिलसिले में आते- जाते रहते हैं।

इन जापानियों की संख्या लगभग पांच हजार के आसपास होगी। इनमें जापानी दूतावास, वसंत कुंज के जापानी स्कूल और फिरोजशाह रोड में स्थित जापानी सूचना केन्द्र में काम करने वाले मुलाजिम भी शामिल हैं। ये सभी भगवान बुद्ध के अनुयायी हैं। ये मानते हैं कि भगवान बौद्ध का जीवन समाज से अन्याय को दूर करने के लिए समर्पित था।

उनकी करुणा भावना ने उन्हें लाखों लोगों तक पहुंचाया। उनका जीवन हमें प्रेम का संदेश देता हैं। इतनी बड़ी तादाद में जापानियों के यहां आने के बावजूद रेंट मार्किट में आग नहीं लगी क्योंकि ये खासे मितव्ययी हैं। साउथ दिल्ली के एक प्रमुख रीयल एस्टेट सलाहकार अनिल माखीजानी कहते हैं कि बड़े से बड़े पद पर काम करने वाला जापानी पेशेवर से एक लाख रुपये से कम पर ही घर किराये पर लेता है।

वो छोटे घर में भी खुशी-खुशी रह लेता है। वो अमेरिका या आस्ट्रेलिया के नागरिकों की तरह बड़ा घर नहीं लेता। वो अपनी जरूरत का ध्यान रखते हैं। अगर बात दिल्ली की हो तो जापानी नागरिक डिफेंस कॉलोनी में एक 200 गज के घर की एक फ्लोर में रह लेते हैं। इन्हें वो ही घर पसंद हैं जिनमे बाथ टब होता है। अगर घर में बाथ टब नहीं है तो ये उस घर को किराये पर नहीं लेते।

अगर कुछ जापानी एक-दूसरे के करीब रहते हैं, तब ये कार पूल करके ही दफ्तर जाना पसंद करते हैं। ये बड़ी-बड़ी कारों में अकेले दफ्तर जाने से बचते हैं। दिखावा करना उन्हें कतई पसंद नहीं होता। वे मेल मिलाप में विश्वास करते हैं। ये जापानी नागरिक भारत के उज्जवल भविष्य को लेकर बेहद आशावादी हैं।

उन्हें लगता है कि अब भारत को विकास के रास्ते पर जाने से कोई रोक नहीं सकता। देश जिस रफ्तार से बढ़ रहा है, जल्द ही भारत विश्व में अपनी अलग पहचान बनाएगा। दिल्ली-गुड़गांव में रहने वाले जापानी प्राय: विवाहित होते हैं। ये दिल्ली-गुड़गांव को इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि ये अपने बच्चों को वसंत कुंज में स्थित जापानी स्कूल में दाखिला दिलवा देते हैं।

जापानी स्कूल लगभग 50 साल से दिल्ली में चल रहा है। ये पहले फिरोजशाह रोड पर ही था। इधर जापानी बच्चों के लिए हिन्दी की अलग से कक्षाएं भी चलती हैं। वे हिन्दी सिखने में गर्व का अनुभव करते हैं। आपको कई जापानी ऐसे मिल जाएंगे जो हिन्दी में बात करते हैं। यहां तक कि उनके बच्चे भी बहुत अच्छी हिन्दी बोल लेते हैं।

निश्चित रूप से जापानी नागरिकों के बीच गुड़गांव खासा पसंद किया जाना लगा है। ये इधर के रेस्तरां, गोल्फ कोर्स और स्तरीय मेडिकल सुविधाओं के चलते किराये पर घर लेना पसंद करते हैं। पर एक जापानी वो भी है, जो अब भारतीय हो चुकी है। वो हिन्दी बोलती है। उनका नाम है कात्सू सान। वो रिंग रोड पर स्थित विश्व शांति स्तूप के कामकाज को देखती हैं।

वो सन 1956 में भारत आ गईं थीं। मन था कि भारत को करीब से देखा-समझा जाए। वो बताती है कि भारत को लेकर उनकी दिलचस्पी बौद्ध धर्म और गांधी जी के कारण प्रबल हुई थी। उनका भारत आने के बाद यहां पर मन इतना लगा कि फिर यहां पर बसने का निर्णय ले लिया। वो कभी-कभी जापान गई भी हैं, पर अब उन्हें भारत ही अपना लगता है।

वो मानती हैं कि भारत संसार का अध्यातिमक विश्व गुरु है। यहां ज्ञान वो वो रसधारा है जो आपको पूरे विश्व में कहीं और नहीं मिलती। मन को जो सुकून यहां मिलता है वो अन्य कहीं नहीं। हमारी जापानी कात्सू सान और शेष जापानी नागरिकों की चाहत है कि भारत-जापान दुनिया को शांति का मार्ग दिखलाते हैं। इनमें आपसी सहयोग बढ़ता रहे।

एक बात बहुत से जापानी नागरिकों से बात करने पर समझ आई कि जापान कोई कारोबारी मिजाज वाला देश नहीं है। उदाहरण के रूप में जापान भारत में बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट तो ला रहा है पर बदले में उसकी मंशा भारत का खून चूसना नहीं है। बौद्ध के अलावा जापान में गुरुदेव रविन्द्रनाथ टेगौर का बहुत सम्मान किया जाता है। वे वहां पर कई बार गए।

जापानियों के मन भारत कौतहूल पैदा करता था। टोक्यो यूनिवर्सिटी में हिन्दी का अध्यापन साल 1908 से चालू हो गया था। भारत से बाहर सबसे पहले हिन्दी की टोक्यो यूनिवर्सिटी में ही पढ़ाई चालू हुईं थीं। इस पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्रा का सफल होना तय है।

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