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ओमकार चौधरी का लेख : अमेरिका की नाकामी का जुलूस

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन आनन-फ़ानन में वहां से अपनी सेनाएं निकालने के पक्ष में अब चाहे जो दलील दें परंतु काबुल एयरपोर्ट के रनवे पर जो कुछ देखा, वो अमेरिकी नाकामी का ही जुलूस था। ख़ुद को विश्व की महाशक्ति बताने वाला अमेरिका पहली बार किसी देश से दुम दबाकर नहीं भागा है। अतीत में वियतनाम, क्यूबा और सोमालिया से भाग चुका है, पर उसने कभी शिकस्त को स्वीकार नहीं किया। अफ़ग़ानिस्तान से भी वो विफल होकर ही भागा है, परंतु हार के तौर पर स्वीकार नहीं कर रहा। अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि तालिबान के लौटने के बाद भारत की चुनौतियां और ख़तरे किस तरह से बढ़ने जा रहे हैं। तालिबान अभी तो भारत से अच्छे संबंधों की वकालत कर रहा है, परंतु अतीत में उसका रवैया कैसा रहा है, उसी के दृष्टिगत फ़ैसले लेने होंगे।

ओमकार चौधरी का लेख : अमेरिका की नाकामी का जुलूस
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ओमकार चौधरी

ओमकार चौधरी

पूरी दुनिया ने सोमवार, सोलह अगस्त को काबुल एयरपोर्ट के रनवे पर जो दृश्य देखा, वो अभूतपूर्व है। एक अमेरिकी विमान उड़ान के लिए तैयार है। रनवे पर दौड़ना शुरू कर चुका है, पर हज़ारों की भीड़ उसके साथ दौड़ रही है। कई उस पर लटकने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ टायरों के ऊपर बनी जगह पर चढ़ने और बैठने में सफल भी हो जाते हैं। जैसे ही विमान टेकआफ करता है, तीन लोग गिरते हैं और मारे जाते हैं। तालिबान से भयभीत हज़ारों लोगों की भीड़ अफगानिस्तान छोड़कर भाग जाने के लिए काबुल एयरपोर्ट पर पहुंच जाती है। अव्यवस्था और अराजकता का आलम यह है कि बिना रोक-टोक के वह भीड़ रनवे तक पहुंच जाती है। अमेरिकी विमान के साथ-साथ दौड़ना शुरू कर देती है। यह सब क्या है? अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन आनन-फ़ानन में वहां से अपनी सेनाएं निकालने के पक्ष में अब चाहे जो दलील दें परंतु सबने काबुल एयरपोर्ट के रनवे पर जो कुछ देखा, वो अमेरिकी नाकामी का जुलूस था। यह सही है कि अफ़ग़ानिस्तान की सेना ने तालिबानियों के सामने घुटने टेक दिए। राष्ट्रपति अशरफ़ गनी अपनी जान बचाने के लिए देश छोड़कर भाग खड़े हुए और प्रांतीय सरकारों ने बिना प्रतिरोध के एक-एक कर आत्मसमर्पण कर दिया, लेकिन सशस्त्र तालिबान जिस तरह आंधी-तूफान की तरह सब कुछ उखाड़ते हुए आगे बढ़ते गए, उसके लिए हरेक के दिल में दहशत का माहौल किसने बनाया। कुछ तो तालिबान का खौफनाक इतिहास और उससे भी अहम अमेरिका का वहां से सिर पर पैर रखकर भागने के फैसले ने। लोगों में यही संदेश गया कि जब महाशक्ति कहलाने वाला अमेरिका ही इस तरह भाग रहा है तो उनकी औकात क्या है।

वैसे तो पहले से अमेरिका की छवि इस मामले में कोई बहुत बेहतर कभी नहीं रही, परंतु जिस तरह उसने अफ़ग़ानिस्तान के नागरिकों को तालिबानियों के रहमोकरम पर छोड़ा है और अपना उल्लू सीधा करके रातों-रात निकलने का एकतरफा फैसला किया है, उससे पूरी दुनिया में उसकी साख पर बहुत बड़ा दाग लगा है। अब सहज भाव से कोई उस पर यकीन नहीं करेगा। यहां तक कि भारत जैसे उसके मित्र देश भी, जो चीन और पाकिस्तान की गुस्ताखियों का सामना कर रहा है और अमेरिका के निरंतर अनुरोध और प्रयासों के उपरांत क्वाड में सक्रिय रूप से शामिल हुआ है। भारत जानता है कि पूर्वी और पश्चिमी सीमा से जब भी उसे बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, तब उसे अपने ही दम पर उसका समाधान करना है और इसके लिए उसकी तैयारी भी पुख्ता हैं, परंतु अमेरिका ने जो कुछ अफगानिस्तान में किया, उसके बाद भारत इस कथित महाशक्ति पर बिल्कुल भी आश्रित नहीं रहेगा। वहां की ताजा घटनाओं के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की अपने अमेरिकी समकक्ष से बात हुई है। भारत अफगानिस्तान में फंसे भारतीयों, दूतावास के कर्मचारियों को निकालने के लिए प्रयासरत हैं और आशा की जानी चाहिए कि इसमें सफल भी रहेगा परंतु ऐसा भी वह अपने बल पर ही करेगा, अमेरिका या किसी दूसरे देश के सहारे नहीं। अमेरिका के इस तरह वहां से निकलने की ख़ुद भारत को भी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। बहुत सी परियोजनाएं, जिन पर काम चल रहा था, वो बंद हो जाएंगी और जो पहले भी तैयार हो चुकी हैं, वो भी खतरे की जद में हैं। रूस का इस पूरे घटनाक्रम के दौरान जैसा रुख रहा है, उसके चलते भारत अब उस पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं कर सकता। यह तय मानिए कि पाकिस्तान और चीन की हमारे विरुद्ध साजिशें अब और तेज हो जाएंगी, इसलिए भारत के लिए कहीं अधिक चौकन्ना होकर तैयारियां करने का समय है।

9/11 के भीषण आतंकी हमले के दस दिन बाद अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश ने एक बयान दिया था कि आप या तो हमारे साथ हैं या हमारे खिलाफ और इसके पंद्रह दिन बाद अमेरिकी विमानों से अफगानिस्तान पर बमबारी शुरू कर दी थी। अलकायदा को खत्म करने का दावा करने वाले अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडेन का कहना है कि पिछले बीस साल में अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में ढूंढ निकाला और खत्म कर दिया। अफगानी सेनाओं को ट्रेंड किया, अत्याधुनिक हथियार दिए। उन्हें वेतन दिया परंतु अमेरिका वहां सिविल वार रोकने या राष्ट्र निर्माण के लिए नहीं गया था। अलकायदा के भविष्य के खतरे को खत्म करने के लिए गया था, वो अपने मिशन में सफल रहा, परंतु तालिबान या दूसरी ताकतों से लड़ने की जिम्मेदारी उसकी नहीं, खुद अफगानिस्तान और उसकी सेना की थी। बाइडेन ने अफगानिस्तान के भगोड़े राष्ट्रपति और सेना की यह कहते हुए निंदा की कि जो कुछ होता दिखाई दे रहा है, इसके लिए वही जिम्मेदार हैं, अमेरिका नहीं। अगर वो लड़ने के बजाय सहज भाव से आत्मसमर्पण करने को तैयार हैं तो अमेरिका अपनी सेना को ख़तरे में क्यों डालेगा, इसलिए समय रहते उन्होंने वहां से निकलने का फैसला किया है। वैसे, खुद को विश्व की महाशक्ति बताने वाला अमेरिका पहली बार किसी देश से दुम दबाकर नहीं भागा है। ऐसा करने का उसका लंबा इतिहास है। वह ठीक इसी तरह अतीत में वियतनाम, क्यूबा और सोमालिया से भाग चुका है, पर उसने कभी शिकस्त को स्वीकार नहीं किया। अफगानिस्तान से भी वो विफल होकर ही भागा है, परंतु इसे हार के तौर पर स्वीकार नहीं कर रहा।

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान के लौट आने के बाद भारत की चुनौतियां और खतरे किस तरह से बढ़ने जा रहे हैं। हमारी वहां जो भी परियोजनाएं हैं, वो तो ठप होनी ही हैं। संसद, सलमा बांध और भारत के व्यापार के लिहाज़ से बहुत अहम सिल्क रूट भी खतरे की जद में आ गए हैं। बात यहीं तक सीमित रहती तो भी समझ में आता परंतु खतरा इससे कहीं बड़ा है। चीन और पाकिस्तान तालिबान के लिए भारत के विरुद्ध दूसरी तरह के खतरे पैदा करने के लिए पूरी ताक़त और प्रभाव का इस्तेमाल करने वाले हैं। अफगानिस्तान में हमारे प्रत्यक्ष मिशन के अलावा कई अप्रत्यक्ष मिशन भी चल रहे थे, वो भी अब बंद हो जाएंगे। पाकिस्तान की चालबाजियों की सूचनाएं मिलनी बंद हो जाएंगी। इसके अलावा लगातार प्रयासों की वजह से अशांत जम्मू-कश्मीर में जो सामान्य हालात हुए हैं, उन्हें पलीता लगाने की साजिशें नए सिरे से शुरू की जा सकती हैं, इसलिए भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान और सेना-सुरक्षाबलों को चौगुने प्रयासों से उन्हें विफल करने के लिए कमर कसनी होगी। जब से भारत अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के साथ क्वाड में शामिल हुआ है तब से रूस के सुर बदले हुए हैं, इसलिए उसके हर कदम पर भी करीबी निगाह रखनी होगी। तालिबान अभी तो भारत के साथ अच्छे संबंधों की वकालत कर रहा है परंतु अतीत में उसका रवैया कैसा रहा है, उसे दृष्टि में रखकर ही फैसले लेने होंगे।

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