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Triple Talaq Bill : क्या है तीन तलाक और इस्लाम के अनुसार कितने तरीके से बोल सकते हैं 'तलाक-तलाक-तलाक'

Triple Talaq Bill : सच बात यह है कि तीन तलाक का जिक्र इस्लाम के प्रमुख ग्रंथ कुरान और हदीस में है ही नहीं। कुरान में तलाक के कई और नियम लिखे हैं। तीन तलाक या फिर कहें तलाक-ए-बिदअत का उल्लेख कुरान में न होते हुए भी इस्लाम का प्रमुख अंग समझकर अपनाया जा रहा है। एक झटके में तलाक-तलाक-तलाक कह देने की परपंरा ने देश में एक खास जगह बना ली है। जबकि इस्लाम में तलाक देने और लेने के और भी कई तरीके मौजूद हैं जिससे महिलाओं का भला होता है।

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Triple Talaq Bill In Lok Sabha : 17वीं लोकसभा के गठन के बाद शुक्रवार को तीन तलाक (Triple Talaq) को गैर कानूनी ठहराने वाला मुस्लिम महिला विधेयक पेश किया गया। उम्मीद के मुताबिक सदन में जमकर शोर शराबा हुआ। और पहले की तरह ही यह अधर में लटकता दिखाई दे रहा है। मोदी सरकार ने पहले कार्यकाल में भी ये बिल पेश किया था जो लोकसभा से तो पास हो गया पर राज्यसभा में बहुमत न होने के कारण अटक गया था।

सरकार ने जब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में शरण ली तो वहां से आदेश जारी हुआ की केंद्र सरकार अगले 6 महीने में ट्रिपल तलाक पर कानून बनाए, इतना कहकर कोर्ट ने तीन तलाक की प्रथा पर रोक लगा दी। अभी तक इस मामले पर देश में जमकर राजनीति हुई है. मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए भाजपा जहां ये बिल लाती है वहीं विपक्ष इसमें खामी बताकर इसका विरोध शुरू कर देता है। जितना शोर सदन के अन्दर होता है उतना ही देश की सड़कों, गलियों और सोशलमीडिया पर भी होता है।

तलाक-ए-बिदअत (तलाक क्या है / What Is Triple Talaq)

सच बात यह है कि तीन तलाक का जिक्र इस्लाम के प्रमुख ग्रंथ कुरान और हदीस में है ही नहीं। कुरान में तलाक के कई और नियम लिखे हैं। तीन तलाक या फिर कहें तलाक-ए-बिदअत का उल्लेख कुरान में न होते हुए भी इस्लाम का प्रमुख अंग समझकर अपनाया जा रहा है। एक झटके में तलाक-तलाक-तलाक कह देने की परपंरा ने देश में एक खास जगह बना ली है। जबकि इस्लाम में तलाक देने और लेने के और भी कई तरीके मौजूद हैं जिससे महिलाओं का भला होता है।


तलाक-ए-अहसान

कहा जाता है कि अरब में महिलाओं की स्थिति बेहद दयनीय थी वे एक दूसरे के हाथों जानवरों की तरह बेची जाती थी, महिलाओं को बच्चा पैदा करने की मशीन समझा जाता था। उनके अधिकार को लेकर कोई कानून बना ही नहीं था। पैगम्बर हजरत मोहम्मद ने इसे बेहद गलत बताया और उन्होंने तलाक-ए-अहसान का नियम लगाया। इस नियम के तहत पति-पत्नी अगर एक दूसरे से अलग होना चाहते हैं तो एक बार तलाक बोलने के बाद तीन महीने दोनों अलग रहते हैं।

इन तीन महीनों में अगर पति-पत्नी फिर से एक साथ रहना चाहते हैं तो वह रह सकते हैं और अगर नहीं रहना चाहते तो दोनों में आपसी सहमति से तलाक हो जाता था। तलाक के इस तरीके को दुनिया के तमाम इस्लामिक देश मानते हैं क्योंकि यहां महिलाओं को भी अपनी बात रखने और स्वयं फैसला लेने की आजादी मिलती है। पर इस्लाम के तमाम धर्म गुरुओं ने भारत में तीन तलाक को सही बता कर इसे ही समाज में लागू कर दिया।

तलाक के नियम

इस्लाम में तलाक के कई और तरीके हैं, जैसे तलाक-ए-अहसान, तलाक-ए-मुबारत और तलाक-ए-हसन पर तीन तलाक की ही ज्यादा चर्चा होती है जो कहीं से भी सही नहीं माना जाता। इसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी शक के दायरे में आता है। जो अपने बयानों में लगातार संतुलन बनाने की कोशिश करता रहता है। लोगों ने सवाल उठाया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड एक खास वर्ग को खुश रखने की कोशिश करता है। जबकि उसे भी पता है कि तीन तलाक इस्लाम की मान्यताओं को ठेस पहुंचाता है।


भारत में तलाक का इतिहास (Talaq In India History)

बात अगर भारत में तलाक की करें तो मुस्लिमों में करीब 24 फीसदी महिलाएं तलाक के दंश को झेल रही हैं। हालाकि ये आंकड़ा सिर्फ तीन तलाक के जरिए ही नहीं है इसमें सभी प्रकार के तलाक शामिल है पर बहुतायत तीन तलाक से ही पीड़ित हैं। शिया समुदाय तलाक-ए-बिदअत को सुन्नी कम्युनिटी का हिस्सा मानता है। वह कहता है कि सुन्नी समुदाय में यह 1000 साल से कायम है, जब भी विरोध की आवाज उठती है तो धर्मगुरू आवाज को दबाने की कोशिश करते हैं।

फिलहाल तीन तलाक को लेकर चल रही सियासी लड़ाई आगे कितने और दिन चलेगी ये कह पाना बेहद मुश्किल है। जरूरत है कि इस्लामिक धर्म गुरू स्वयं आगे आए और तीन तलाक को अवैध बताएं। सम्मान से जीने का जितना अधिकार पुरुषों को है उतना ही महिलाओं को भी है। उनके अधिकारों का हनन कहीं से भी न्यायोचित है।

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