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हरियाली तीज का महत्व, जानें क्या है सावन से इसका नाता

हरियाली तीज का पर्व विवाहित महिलाओं के लिए उल्लास का अवसर लेकर आता है।

हरियाली तीज का महत्व, जानें क्या है सावन से इसका नाता
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सावन के महीने में रिम-झिम फुहारों के पड़ते ही हर ओर एक नई उमंग, नई ऊर्जा का संचार हो जाता है। इसी माह में हरियाली तीज का पर्व विवाहित महिलाओं के लिए उल्लास का अवसर लेकर आता है। भीगे-भीगे नैसर्गिक सौंदर्य के बीच यह पर्व, धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा के साथ दांपत्य जीवन की प्रगाढ़ता का संदेश भी देता है।

सावन का महीना, झमाझम बरसते मेघ, दूर-दूर तक बिखरी हरियाली, इस तरह प्रकृति का अप्रतिम सौंदर्य बहुत ही मनमोहक लगता है। सावन में प्रकृति अपना रूप-रंग ही नहीं बदलती, हमारा जीवन भी बदलता है। इसी सुहानी ऋतु में ही आता है हरियाली तीज का पर्व।

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सावन और हरियाली तीज का गहरा नाता

सावन और हरियाली तीज का बहुत गहरा नाता है। किसी ऋतु और त्योहार का ऐसा संगम शायद ही देखने को मिले। स्त्री जीवन में इस संगम का बहुत महत्व है, जहां सावन की हरियाली हमारे भीतर नवऊर्जा का संचार करती है, वहीं हरियाली तीज का अपना एक धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।

तीज पर महिलाएं शिव-पार्वती की आराधना करके अपने मंगलमय दांपत्य जीवन की कामना करती हैं। तीज न सिर्फ सुखी दांपत्य जीवन की कामना का पर्व है, पूरे परिवार के सुखमय जीवन की कामना का भी पर्व है। दांपत्य जीवन अगर खुशहाल है तो पूरा परिवार खुशहाल होगा ही।

तीज के अवसर पर कुटुंब ही नहीं मोहल्ले-टोले की महिलाएं भी एक जगह एकत्र होकर शिव-पार्वती की पूजा करती हैं। इससे महिलाएं एक–दूसरे से जुड़ती हैं, रिश्ते-नातों में ताजगी आती है।

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सावन जोड़ता है पीहर से

विवाहित महिलाओं को तो सावन की प्रतीक्षा विशेष रूप से रहती है। घर-गृहस्थी में हमेशा व्यस्त रहने वालीं इन महिलाओं को सावन में पीहर जाने का अवसर जो मिलता है। वे अपने भाई या पिता के आने की बाट जोहने लगती हैं। गांव-कस्बों में यह परंपरा आज भी बनी हुई है। अमीर खुसरो की कविता की पक्तियां नारी मन की इस प्रतीक्षा को व्यक्त करती है-'अम्मा मेरे बाबा को भेजो री कि सावन आया, अम्मा मेरे भाई को भेजो री कि सावन आया।

इस प्रतीक्षा का अंत तब होता है, जब पीहर से कोई उन्हें लेने आ जाता है। जब वे अपने मायके पहुंचती हैं तो भाई-बहनों का संग मिलता ही है, माता-पिता का प्यार-दुलार के साथ नेह भी मिलता है। साथ ही पेड़ों पर सावन के झूले भी पड़ जाते हैं।

झूले पर वे सखियों संग कजरी गाती हैं। आराम से बैठकर मन की बातें भी साझा करती हैं। कवि सूर्य कुमार पांडेय की कविता 'सावन आया' में सखियों के साथ का ऐसा ही वर्णन है-'झूल रहीं सखियां-सहेलियां, झूला पेंग बढ़ाकर, नाच उठे अनगिन मयूर, वन में मन में इठलाकर, भू पर इंद्रधनुष लहराया, सावन आया।' इस तरह नारी जीवन की एकरसता दूर होती है, वे उल्लासित और ऊजार्वान होती हैं।

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तीज का संदेश

सावन में पीहर आने की खुशी तो महिलाओं को होती ही है, साथ ही इस माह में आने वाले तीज पर्व को लेकर भी मन नई उमंगों से भर उठता है। इस पर्व के माध्यम से महिलाएं अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम को अभिव्यक्त करती हैं। तीज पर्व में दांपत्य जीवन के लिए संदेश भी निहित है। यदि इन्हें जान लिया जाए तो दांपत्य जीवन हमेशा खुशहाल रहेगा।

इसके लिए पहले हरियाली तीज से जुड़ी पौराणिक कथा को जानना होगा। देवी पार्वती ने जीवनसाथी के रूप में भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तप किया था। उनको अपने प्रेम, समर्पण पर पूरा विश्वास था कि वह शिव की अर्धांगिनी बनेंगी। जबकि शिव वैरागी थे, उन्होंने पार्वती को समझाया भी कि वह महलों में रहने वाली राजकुमारी हैं, कैलाश पर सुख-सुविधा विहीन जीवन कैसे जिएंगी। लेकिन पार्वती हर त्याग के लिए तैयार थी।

आखिर में पार्वती का प्रेम विजयी हुआ, उन्होंने शिव को सदा के लिए पा लिया। इस तरह शिव-पार्वती ने अपने दांपत्य जीवन की नींव रखी। यह इन दोनों का एक-दूसरे के प्रति समर्पण ही था, जो अलग-अलग प्रकृति के होने के बाद भी एक हुए। शिव-पार्वती को आदर्श दांपत्य का प्रतीक माना जाता है। यदि इसी तरह के समर्पण और प्रेम को हर दंपती अपने जीवन में आत्मसात करे तो दांपत्य जीवन हमेशा खुशहाल बना रहेगा।

कभी ना भूलें अपने तीज-त्योहार

देखा जाता है कि गांव-कस्बों और छोटे शहरों से निकलकर बड़े शहर या मेट्रो सिटी में आकर बसे लोग उस तरह से अपने पारंपरिक पर्व नहीं मानते, जैसे अपने गांव-शहर में मान लिया करते थे। इसका यह मतलब नहीं कि हम अपने संस्कृति से कट जाएं। भले ही हम अपने पर्व पूरे विधि-विधान से न मना पाएं, लेकिन इसे महानगरीय आधुनिक जीवनशैली में बिसरने न दें।

आज महानगरों में जिस बदलाव के साथ तीज-त्योहार मनाए जाते हैं, उन्हें आप भी मनाएं। अपनी संस्कृति की भावना और उद्देश्यों को भूले नहीं। आज सभी छोटे-बड़े शहरों में सावन और तीज के अवसर पर बड़े भव्य आयोजन होते हैं, यहां भी झूले डाले जाते हैं, गीत गाए जाते हैं। ताल से ताल मिलाकर महिलाएं नृत्य करती हैं। इस तरह महिलाएं अपने आस-पड़ोस की महिलाओं के संग तीज के उल्लास-उमंग में डूब सकती हैं।

कहने का सार यही है कि हम तीज जैसे त्योहार और मनभावन

सावन का महत्व समझें, जिससे जीवन में उल्लास-उमंग बना रहे। हमें अपनी उस संस्कृति और परंपरा से भी जुड़े रहना चाहिए, जो हमारे घर-परिवार, कुटुंब और समाज को बांधे है, जिनके कारण जीवन मूल्य बने हुए हैं।

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