मुंबई। भारतीय मुद्रा में तेज गिरावट देखने को मिली है और यह पहली बार डॉलर के मुकाबले 92.62 के नए निचले स्तर पर पहुंच गई है। यह अब तक का सबसे कमजोर स्तर है। रुपए में यह गिरावट ऐसे समय पर आई है, जब पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल देखने को मिल रही है। भारत जैसे देश, जो ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं, उनके लिए यह स्थिति आर्थिक दबाव बढ़ाने वाली साबित हो रही है।
संघर्ष के बाद 40% बढ़ीं कच्चे तेल की कीमतें
ब्रेंट क्रूड की कीमतों में हालिया संघर्ष के बाद करीब 40 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है। इससे देश को ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है, जिससे रुपए पर दबाव बढ़ा है। जब आयात महंगा होता है, तो मुद्रा कमजोर होना स्वाभाविक माना जाता है। इसके अलावा, वैश्विक निवेशकों का रुख भी इस गिरावट का एक अहम कारण है।
अनिश्चित माहौल के चलते विदेशी निवेशक सतर्क हो गए हैं और उभरते बाजारों से पूंजी का प्रवाह धीमा पड़ रहा है। इसका असर भारतीय मुद्रा पर पड़ता है। इसी दौरान फेडरल रिजर्व के ब्याज दर संबंधी फैसलों को लेकर भी बाजार में चिंता बनी हुई है। इससे डॉलर मजबूत हो रहा है।
अन्य मुद्राओं की तुलना में रुपए में ज्यादा गिरावट
अन्य एशियाई मुद्राओं से तुलना करें, तो रुपये में गिरावट ज्यादा देखने को मिली है। जहां चीन की मुद्रा युआन में हल्की कमजोरी आई है, वहीं सिंगापुर डॉलर में भी गिरावट सीमित है। भारत पर मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों का असर अपेक्षाकृत ज्यादा पड़ रहा है।
यदि पश्चिम एशिया में तनाव बना रहता है और तेल की कीमतें ऊंची रहती हैं, तो रुपए में आगे भी कमजोरी रह सकती है। साथ ही, जलडमरूमध्य जैसे अहम मार्गों में आपूर्ति बाधित होने की आशंका भी बाजार की चिंता बढ़ा रही है। निकट भविष्य में रुपए के 91.95 से 92.65 के बीच रहने की संभावना है।