मिडिल ईस्ट में जारी संकट का असर भारत पर काफी पड़ता दिख रहा। रुपये में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की गई है। दशक में सबसे खराब साल की ओर भारतीय करेंसी बढ़ती दिख रही।

नई दिल्ली. भारतीय रुपया शुक्रवार को रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। डॉलर के मुकाबले यह पहली बार 94 के पार फिसल गया और 94.81 पर बंद हुआ। दिन के दौरान यह 94.84 के ऑल-टाइम लो तक भी पहुंचा।

मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध और ऊर्जा संकट की वजह से रुपये पर भारी दबाव बना हुआ, जिससे यह एक दशक से ज्यादा समय में सबसे खराब वित्तीय वर्ष की ओर बढ़ रहा।

वित्त वर्ष में 11 फीसदी तक टूटा रुपया
इस वित्त वर्ष (अप्रैल से मार्च) में रुपया करीब 11% तक कमजोर हो चुका। अगर ऐसा ही ट्रेंड जारी रहा, तो 2011-12 के बाद यह सबसे बड़ी गिरावट होगी, जब यूरोप के कर्ज संकट और विदेशी निवेश की कमी के चलते रुपया करीब 14% टूट गया था। वहीं, सिर्फ फरवरी के अंत में शुरू हुए ईरान युद्ध के बाद से ही रुपया करीब 4% गिर चुका। 

वैश्विक ऊर्जा सप्लाई के कारण रुपये पर दबाव
विशेषज्ञों के मुताबिक, इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह मिडिल ईस्ट का मौजूदा संकट है, जिसने वैश्विक ऊर्जा सप्लाई को बुरी तरह प्रभावित किया है। तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर करीब 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई। इससे भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।

होर्मुज संकट खिंचा तो और परेशानी बढ़ सकती
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ बातचीत के लिए समय बढ़ाने के बावजूद बाजार में कोई राहत नहीं दिखी। निवेशकों को डर है कि अगर होर्मुज स्ट्रेट में सप्लाई बाधित हुई, तो हालात और बिगड़ सकते। इसका असर सिर्फ तेल ही नहीं, बल्कि गैस, प्लास्टिक और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर भी पड़ सकता।

निफ्टी में भी गिरावट जारी
इस वैश्विक अनिश्चितता का असर शेयर बाजार और बॉन्ड मार्केट पर भी पड़ा है। शुक्रवार को निफ्टी करीब 2% गिर गया, जबकि 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड बढ़कर 6.94% पर पहुंच गई। बढ़ती यील्ड और महंगाई की आशंका निवेशकों को सतर्क बना रही है।

भारत की विकास दर भी कम रह सकती
आर्थिक विशेषज्ञों ने भारत की ग्रोथ अनुमान को भी कम किया और माना जा रहा है कि आने वाले समय में रिजर्व बैंक ब्याज दरें बढ़ा सकता। ANZ के अर्थशास्त्री संजय माथुर के मुताबिक, भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सरकार और आम लोगों के पास फिलहाल ज्यादा वित्तीय सुरक्षा नहीं। ऐसे में सरकार को या तो फिस्कल डेफिसिट बढ़ाना होगा या पूंजीगत खर्च में कटौती करनी पड़ सकती।

इस बीच, सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटाई है और कुछ फ्यूल एक्सपोर्ट पर टैक्स बढ़ाया है, ताकि महंगाई को काबू में रखा जा सके।

मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है और तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो रुपया और कमजोर हो सकता है। कुछ विदेशी संस्थाएं तो रुपये के 96 प्रति डॉलर तक जाने का अनुमान लगा रही हैं।

(प्रियंका कुमारी)