PLI Scheme: भारत में इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर बाजार तेजी से बढ़ रहा है। सड़कों पर इलेक्ट्रिक स्कूटरों की बढ़ती संख्या के पीछे केंद्र सरकार की ऑटो पीएलआई (Production Linked Incentive) योजना की बड़ी भूमिका मानी जा रही है। लेकिन हाल ही में थिंक टैंक C-DEP (सेंटर फॉर डिजिटल इकोनॉमी पॉलिसी रिसर्च) की एक रिपोर्ट ने इस योजना को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या है विवाद की जड़?
पीएलआई स्कीम का उद्देश्य कंपनियों को अधिक उत्पादन करने पर प्रोत्साहन देना है। रिपोर्ट के मुताबिक, जिन कंपनियों को पीएलआई की मंजूरी मिली, उनकी उत्पादन लागत में 13-16% तक की कमी आई। इस लागत लाभ के कारण उन्होंने घरेलू बाजार में अपने स्कूटर की कीमतें आक्रामक रूप से घटाईं और बाजार हिस्सेदारी बढ़ाई। हालांकि, निर्यात बढ़ाने की जो उम्मीद थी, वह पूरी होती नहीं दिख रही।
नॉन-पीएलआई कंपनियां क्यों पिछड़ रहीं?
रिपोर्ट बताती है कि शुरुआती दौर में जिन स्टार्टअप्स और कंपनियों ने रिसर्च एवं डेवलपमेंट (R&D) के दम पर ईवी बाजार खड़ा किया, वे अब दबाव में हैं। नॉन-पीएलआई कंपनियों की ग्रोथ FY22 में +407% थी, जो FY24 में -33% और FY25 में -11% तक गिर गई। यानी लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।
निर्यात के आंकड़े चौंकाने वाले
सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि भारत से होने वाले कुल इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर निर्यात का 77% हिस्सा नॉन-पीएलआई कंपनियों से आता है। वहीं लागत लाभ पाने के बावजूद पीएलआई कंपनियों का निर्यात योगदान 25% से भी कम है। इससे साफ है कि इनोवेशन आधारित कंपनियां ही ग्लोबल बाजार में मजबूत हैं।
चीन से बढ़ती प्रतिस्पर्धा
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि इनोवेशन करने वाली भारतीय कंपनियों को पर्याप्त समर्थन नहीं मिला तो नेपाल, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका जैसे बाजारों में चीनी कंपनियां तेजी से कब्जा जमा सकती हैं।
आगे क्या है विकल्प?
C-DEP ने सुझाव दिया है कि R&D आधारित कंपनियों के लिए अलग विंडो खोली जाए, लोकल मैन्युफैक्चरिंग को प्राथमिकता दी जाए और ‘पहले आओ, पहले पाओ’ नियम लागू हो। साथ ही, टारगेट पूरा न करने वाली कंपनियों की नियमित समीक्षा की जाए, ताकि योजना का लाभ संतुलित रूप से मिल सके।
(मंजू कुमारी)








