परंपरा और गरिमा पर संकट: व्यवस्थाओं पर सवाल उठाते हुए भावुक मन से विदा हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद! प्रशासनिक उपेक्षा से क्षुब्ध होकर त्यागा माघ मेला

प्रयागराज माघ मेले में सुविधाओं के अभाव और प्रशासनिक दुर्व्यवहार से क्षुब्ध होकर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मेला क्षेत्र छोड़ दिया है।

Updated On 2026-01-28 15:11:00 IST

शंकराचार्य के इस पलायन ने आगामी महाकुंभ और अन्य बड़े धार्मिक आयोजनों की तैयारियों पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं।

प्रयागराज: संगम नगरी प्रयागराज के पावन संगम तट पर आयोजित माघ मेला 2026 से एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरे संत समाज और श्रद्धालु जगत को हिलाकर रख दिया है।

ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने प्रशासनिक अव्यवस्थाओं और उपेक्षा की पराकाष्ठा से दुखी होकर मेला क्षेत्र को त्यागने का निर्णय लिया है।

बुधवार को जब वे अपने काफिले के साथ मेला क्षेत्र से बाहर निकले, तो उनकी आँखों में व्यवस्था के प्रति गहरी पीड़ा और निराशा साफ़ देखी जा सकती थी। उन्होंने कहा कि जिस तीर्थराज प्रयाग में संतों का सत्कार होना चाहिए, वहां उन्हें अपमानित किया जा रहा है।

​प्रशासनिक तानाशाही और संतों का अपमान

​शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने शिविर से प्रस्थान करते समय प्रशासन पर तानाशाही का आरोप लगाया। उन्होंने विस्तार से बताया कि शिविर के लिए आवंटित भूमि से लेकर बुनियादी सुविधाओं जैसे बिजली, पानी और मार्ग निर्माण तक में प्रशासन ने जानबूझकर रोड़े अटकाए।

उन्होंने कहा कि यह केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं है, बल्कि उस पीठ और परंपरा का अपमान है जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रशासन का रवैया किसी भी दृष्टि से सहयोगपूर्ण नहीं रहा, जिससे उनकी धार्मिक साधना में लगातार व्यवधान उत्पन्न हुआ।

​मर्यादा की रक्षा के लिए लिया कठोर निर्णय

​स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह कदम किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि संन्यास परंपरा की मर्यादा को बचाने के लिए उठाया है। उन्होंने भावुक होकर कहा, "मैंने अपने जीवन में कभी यह कल्पना नहीं की थी कि प्रयागराज की रेती पर शंकराचार्य जैसे पद को भी सुविधाओं और सम्मान के लिए याचना करनी पड़ेगी।"

उन्होंने बताया कि जब व्यवस्था ही धर्म की संरक्षक न रहकर अवरोधक बन जाए, तो ऐसी जगह पर वास करना उचित नहीं है।

​संगम तट पर भक्तों का रुदन और गहरा आक्रोश

​जैसे ही शंकराचार्य के मेला छोड़ने की खबर शिविरों में फैली, संगम तट पर मौजूद हजारों श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए उमड़ पड़े। स्वामी जी को जाते देख कई भक्त भावुक होकर रोने लगे।

श्रद्धालुओं का कहना है कि प्रशासन ने संतों के साथ जो व्यवहार किया है, वह अक्षम्य है। संत समाज के अन्य प्रमुख संगठनों ने भी इस घटना की कड़ी निंदा की है और इसे माघ मेले के इतिहास का एक काला अध्याय बताया है।

​अव्यवस्थाओं की भेंट चढ़ा आध्यात्मिक प्रवास

​शंकराचार्य के प्रवास के दौरान सुरक्षा व्यवस्था और अनुशासन के नाम पर उनके अनुयायियों और भक्तों को भी काफी प्रताड़ित किया गया।

स्वामी जी ने विस्तार से जानकारी दी कि किस तरह उनके शिविर तक पहुंचने वाले मार्ग को अवरुद्ध किया गया और प्रशासनिक अधिकारियों ने उनकी जायज मांगों को भी अनसुना कर दिया।

उन्होंने कहा कि माघ मेला अब अपनी आध्यात्मिक गरिमा खोकर केवल एक सरकारी इवेंट बनकर रह गया है, जहाँ संतों की वाणी की कोई कीमत नहीं है।

​भविष्य के आयोजनों पर खड़े हुए गंभीर सवाल

​शंकराचार्य के इस पलायन ने आगामी महाकुंभ और अन्य बड़े धार्मिक आयोजनों की तैयारियों पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि शीर्ष संतों के साथ ऐसा ही व्यवहार जारी रहा, तो भविष्य में बड़ी परंपराएं प्रभावित होंगी।

उनके जाने के बाद मेला क्षेत्र में सन्नाटा पसरा है और चर्चा है कि क्या प्रशासन अब इस डैमेज कंट्रोल के लिए कोई कदम उठाएगा या नहीं।

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