फरीदाबाद: एंबुलेंस न मिलने पर ठेले पर ले जाना पड़ा पत्नी का शव, मासूम बेटा ढकता रहा मां की देह
सरकारी सिस्टम की बेरुखी से लाचार पति को पत्नी का शव ठेले पर ले जाना पड़ा। इलाज में 4 लाख रुपये खर्च हो चुके थे और उनके पास निजी एंबुलेंस को देने के लिए रुपये भी नहीं बचे।
हरियाणा के फरीदाबाद से मानवता को शर्मसार कर देने वाली एक हृदयविदारक तस्वीर सामने आई है। स्वास्थ्य सेवाओं के बड़े-बड़े दावों के बीच, एक गरीब परिवार को महिला का शव घर ले जाने के लिए सरकारी वाहन तक नसीब नहीं हुआ। लाचारी का आलम यह था कि जिस ठेले से पति मजदूरी कर परिवार का पेट पालता था, उसी पर पत्नी का शव लादकर सात किलोमीटर का सफर तय करना पड़ा। इस दौरान सात साल का मासूम बच्चा अपनी मां के शव को बार-बार कपड़े से ढकता रहा, जिसे देखकर वहां पर हर व्यक्ति की आंखें नम हो उठीं।
उपचार में जमापूंजी खत्म
मृतका की पहचान 35 वर्षीय सुमित्रा के रूप में हुई है, जो फरीदाबाद के सारण गांव में अपने परिवार के साथ रहती थी। सुमित्रा लंबे समय से टीबी (तपेदिक) की गंभीर बीमारी से जूझ रही थी। पति गुनगुन ने बताया कि पिछले 4 महीनों से वह अपनी पत्नी को बचाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा था। पहले फरीदाबाद के सिविल अस्पताल में इलाज चला, फिर स्थिति बिगड़ने पर दिल्ली के एम्स और सफदरजंग जैसे बड़े अस्पतालों के चक्कर लगाए। इस जद्दोजहद में परिवार की जीवन भर की कमाई और कर्ज मिलाकर करीब 4 लाख रुपये खर्च हो गए, लेकिन सुमित्रा को बचाया नहीं जा सका। अंततः सिविल अस्पताल में इलाज के दौरान उसने दम तोड़ दिया।
निजी एंबुलेंस की मनमानी और प्रशासन की बेरुखी
सुमित्रा की मौत के बाद असली संघर्ष उसके पार्थिव शरीर को घर ले जाने का शुरू हुआ। पति ने आरोप लगाया कि अस्पताल परिसर में मौजूद निजी एंबुलेंस संचालकों ने महज 7 किलोमीटर की दूरी के लिए 700 रुपये की मांग की। पैसे नहीं बचे थे। जब सरकारी मदद की गुहार लगाई गई, तो वहां से भी खाली हाथ रहना पड़ा। थक-हारकर परिवार ने उसी सब्जी ढोने वाले ठेले का सहारा लिया, जो उनकी आजीविका का साधन था। कड़कड़ाती धूप और समाज की संवेदनहीनता के बीच शव को ठेले पर रखकर गांव ले जाया गया।
पति बोला- पत्नी की बीमारी ने आर्थिक रूप से तोड़ दिया
मूल रूप से बिहार का रहने वाला यह परिवार मजदूरी कर जीवन यापन करता है। गुनगुन ने रुंधे गले से बताया कि पत्नी की बीमारी ने उसे आर्थिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया है। अब घर में एक रुपया भी नहीं बचा है, यहां तक कि सुमित्रा के अंतिम संस्कार के लिए भी उसे दूसरों के आगे हाथ फैलाकर कर्ज लेना पड़ रहा है। अस्पताल की मोर्चरी के बाहर का वह दृश्य, जिसमें एक छोटा बच्चा अपनी मृत मां की गरिमा बचाने के लिए उसे कपड़े से ढंक रहा था, सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
प्रशासन ने मामले की जांच के आदेश दिए
इस शर्मनाक घटना पर सफाई देते हुए सिविल अस्पताल के डिप्टी सिविल सर्जन डॉ. एमपी सिंह ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग की एंबुलेंस सेवाओं का उपयोग केवल मरीजों को लाने-ले जाने के लिए होता है, शवों के लिए नहीं। उन्होंने बताया कि मृतकों के लिए 'हर्ष वैन' या मोर्चरी वैन की सुविधा रेडक्रॉस के माध्यम से उपलब्ध होती है, जिसे कंट्रोल रूम के जरिए मंगाया जा सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यदि किसी परिवार को शव ठेले पर ले जाना पड़ा है, तो यह अत्यंत दुखद है। प्रशासन ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं।
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