रायपुर साहित्य महोत्सव: दूसरे दिन उपनिषद से एआई तक, पत्रकारिता, नई पीढ़ी का फिल्म से लेकर लोकगीतों पर हुई सार्थक परिचर्चा
रायपुर साहित्य उत्सव के दूसरे दिन विभिन्न मंडपों पर कई क्षेत्रों के विद्वतजनों ने अपने विचार साझा किए। छत्तीसगढ़ी लोकगीतों पर भी सार्थक चर्चा हुई।
उपनिषद से एआई तक विषय पर आयोजित परिचर्चा में वक्ताओं ने रखे विचार
रायपुर। नवा रायपुर में आयोजित साहित्य महोत्सव 2026 के दूसरे दिन अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों के साथ ही फिल्म, पत्रकारिता और कला जगत की हस्तियों से महोत्सव परिसर गुलजार रहा। कवि-कथाकार अनिरुद्ध नीरव मंडप पर साहित्य : उपनिषद से एआई तक विषय पर केंद्रित परिचर्चा आयोजित हुई। वहीं ‘नई पीढ़ी की फिल्मी दुनिया’ पर परिचर्चा, सिनेमा और साहित्य के संबंधों पर भी विमर्श हुआ। वहीं ‘भारत का बौद्धिक विमर्श’ सत्र वैचारिक मंथन का केंद्र बना। इसी तरह लोकगीतों पर भी जीवंत परिचर्चा हुई।
कवि-कथाकार अनिरुद्ध नीरव मंडप पर साहित्य : उपनिषद से एआई तक विषय पर केंद्रित परिचर्चा आयोजित हुई। इस परिचर्चा में वक्ता के रूप में ट्रिपल आईटी नवा रायपुर के डायरेक्टर डॉ. ओमप्रकाश व्यास, वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रफुल्ल केतकर, वरिष्ठ लेखक डॉ. गोपाल कमल शामिल हुए। परिचर्चा के सूत्रधार साहित्यकार संजीव तिवारी रहे, परिचर्चा का यह सत्र कवि जगन्नाथ प्रसाद भानु को समर्पित रहा। इस अवसर पर डॉ. गोपाल कमल द्वारा लिखित पुस्तक, गुणाढ्य की गुणसूत्र कथा का विमोचन किया गया।
ट्रिपल आईटी के डायरेक्टर डॉ. ओमप्रकाश व्यास ने कहा कि, एआई का जो रूप आज हम देख रहे हैं, इसके पीछे विगत 30–40 वर्षों की मेहनत है। एआई निरंतर निखरता जा रहा है। तकनीक खुद को परिमार्जित करती जाती है, यह प्रक्रिया सतत है। वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रफुल्ल केतकर ने परिचर्चा को संबोधित करते हुए कहा कि गीता के 18 अध्यायों में सभी तरह के ज्ञान का समावेश है। एआई को लेकर लोग चिंतित हैं कि, एआई का फ्यूचर क्या होगा। एआई के आधार पर जापान ने जब रोबोट बनाया तो वह स्वयं को नेगेटिव प्रॉम्प्ट देने लगा। एआई कमांड और प्रॉम्प्ट पर काम करता है। एआई वही बताता है जो नेट पर उपलब्ध है। श्री केतकर ने कहा कि हमारे ऋषि सूचना की नहीं, ज्ञान की बात करते थे। वे एआई से बहुत ज्यादा आगे थे।
...तो ये मिट्टी भी रोये इस धरती की : रुबिका लियाकत
रायपुर साहित्य उत्सव के दूसरे दिन अभिनव नीरव मंडल के प्रथम सत्र में विचारोत्तेजक संवाद और सारगर्भित विमर्श हुआ। मुख्य अतिथि के रूप में आईं वरिष्ठ पत्रकार रुबिका लियाकत एवं छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा के मध्य रोचक परिचर्चा सम्पन्न हुई। सुश्री लियाकत ने राष्ट्रवाद पर कहा कि, जब हम मिट्टी में मिल रहे हों, तो यह मिट्टी भी रोए इस धरती की। उन्होंने पत्रकारिता के 18 वर्षों के अनुभव साझा करते हुए युवाओं को आगाह किया कि, सोशल मीडिया पर आए 30 सेकंड के वीडियो पर आँख मूँदकर भरोसा न करें, बल्कि तथ्यों की स्वयं पड़ताल करें।
प्रश्नोत्तर सत्र में पत्रकार बनने की आकांक्षा रखने वाली पत्रकारिता की छात्रा के प्रश्न पर उन्होंने परिश्रम, सत्यनिष्ठा और निर्भीकता को सफलता की कुंजी बताया। धर्म और राष्ट्रवाद से जुड़े प्रश्नों पर उन्होंने कहा कि किसी भी ग्रंथ या विचार को गुरु से समझना चाहिए, संदर्भ जानना चाहिए, और किसी की बातों में बहकर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए क्योंकि एक ही बात के कई अर्थ हो सकते हैं। राष्ट्रवाद के प्रश्न पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि मैं हमेशा भारत और राष्ट्रवाद को चुनूँगी।
छत्तीसगढ़ के साहित्य पुरोधा और काव्य संग्रह 'अम्मा की चाय' का विमोचन
कार्यक्रम के अंत में उन्होंने दो पुस्तकों का विमोचन किया, जिसमें जनसम्पर्क विभाग द्वारा प्रकाशित छत्तीसगढ़ के साहित्य पुरोधा एवं पूजा अग्रवाल की काव्य संग्रह 'अम्मा की चाय' शामिल थे। सत्र में बड़ी संख्या में युवा, साहित्यप्रेमी और पत्रकारिता से जुड़े लोग शामिल हुए।
‘नई पीढ़ी की फिल्मी दुनिया’ पर सार्थक परिचर्चा
रायपुर साहित्य उत्सव के अंतर्गत श्यामलाल चतुर्वेदी मंडप में आज “नई पीढ़ी की फिल्मी दुनिया” विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम में अभिनेता श्री सत्यजीत दुबे, अभिनेत्री टीजे. भानु, विधायक एवं प्रसिद्ध कलाकार अनुज शर्मा तथा सुविज्ञा दुबे विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। अनुज शर्मा ने कहा कि छत्तीसगढ़ी भाषा अत्यंत सरल और सहज है, जिसे संवाद के माध्यम से और अधिक सुलभ बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय महिलाओं की सशक्त भूमिका का है, जहां सिनेमा और समाज दोनों क्षेत्रों में उनका योगदान निरंतर बढ़ रहा है।
अभिनेता सत्यजीत दुबे ने कहा कि, किसी भी फिल्म में भावनात्मक तत्व होना आवश्यक है, तभी वह दशकों तक दर्शकों के मन में जीवित रहती है। अभिनेत्री टीजे. भानु ने कहा कि, डिजिटल माध्यमों, विशेषकर यूट्यूब, ने नए कलाकारों के लिए अवसरों के द्वार खोले हैं। छोटी कहानियां अब विभिन्न मंचों के माध्यम से व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंच रही हैं। उन्होंने कहा कि यात्रा का सुख केवल गंतव्य तक पहुंचने में नहीं, बल्कि पूरी यात्रा प्रक्रिया में निहित होता है। उन्होंने यह भी कहा कि जब महिलाएं निर्माता की भूमिका निभाती हैं, तो वे सेट पर कार्यरत प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं और भावनाओं का ध्यान रखती हैं। उन्होंने सिनेमा में दृश्यात्मक प्रस्तुति को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
‘भारत का बौद्धिक विमर्श’ सत्र बना वैचारिक मंथन का केंद्र
विभिन्न सत्रों के बीच ‘भारत का बौद्धिक विमर्श’ विषय पर आयोजित विशेष सत्र ने सबसे अधिक ध्यान आकर्षित किया, जिसने बुद्धिजीवियों, युवाओं और श्रोताओं को गहन विचार के लिए प्रेरित किया। इस सत्र के मुख्य वक्ता प्रख्यात विचारक एवं लेखक श्री राम माधव रहे। उन्होंने अपने संतुलित और तार्किक वक्तव्य के माध्यम से भारतीय चेतना को आधुनिक संदर्भों में प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। श्री राम माधव ने कहा कि किसी भी जीवंत राष्ट्र के लिए उसका बौद्धिक विमर्श उसकी प्राणवायु होता है। उन्होंने प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान और वैश्विक राजनीति से जोड़ते हुए यह स्पष्ट किया कि भारत का चिंतन न केवल मौलिक है, बल्कि तार्किक कसौटी पर भी पूरी तरह खरा उतरता है।
लोकगीतों पर हुई जीवंत परिचर्चा
रायपुर साहित्य उत्सव के दूसरे दिन प्रथम सत्र में लाला जगदलपुरी मंडप में छत्तीसगढ़ के लोकगीतों पर परिचर्चा आयोजित हुई। इसमें डॉ. पीसी लाल यादव, शकुंतला तरार, बिहारीलाल साहू और डॉ. विनय कुमार पाठक विशेष अतिथि के रूप में शामिल हुए तथा अपने विचार रखें। डॉ. पीसी लाल यादव ने कहा कि, वर्तमान समय में छत्तीसगढ़ के लोकगीत मानवता के पक्षधर हैं, जो हमें रास्ता दिखाने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोकगीतों को गर्व से संजोकर रखने का दायित्व अब युवा पीढ़ी का है।
परिचर्चा में दूसरी वक्ता शकुंतला तरार ने बस्तर के लोकगीतों और उनके महत्व को अनूठे अंदाज में प्रस्तुत किया। बस्तर के लोकगीत सुनाकर उन्होंने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने घोटुल के इतिहास, लिंगोपेन देवता की पूजा पद्धति में गाए जाने वाले ककसार गीत (जो महिलाओं द्वारा गाए जाते हैं) आखेट पर जाते पुरुषों के लिए महिलाओं द्वारा गाए मंगल गीत, छेरछेरा परंपरा, जगार धार्मिक पर्व में धनकुल गीत तथा 650 वर्षों से चली आ रही बस्तर दशहरा पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बस्तर पंडुम द्वारा सरकार के कार्यों की भी सराहना की।
डॉ. अम्बेडकर 'विचारपुंज की आभा’ विषय पर परिचर्चा
पंचम सत्र अंतर्गत पुरखौती मुक्तांगन स्थित लाला जगदलपुरी मंडप में “डॉ. अम्बेडकर विचारपुंज की आभा” विषय पर एक विचारोत्तेजक परिचर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रख्यात चिंतक डॉ. राजकुमार फलवारिया उपस्थित रहे। अपने वक्तव्य में डॉ. राजकुमार फलवारिया ने कहा कि भारत के सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक क्षेत्र, मीडिया जगत तथा अनेक दलित संगठनों द्वारा डॉ. भीमराव अम्बेडकर को केवल दलितों का नेता मानने की धारणा अधूरी और सीमित है।
उन्होंने ऐतिहासिक घटनाओं, तथ्यों तथा बाबासाहेब के विचारों के माध्यम से स्पष्ट किया कि डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण समाज के नेता, चिंतक और मार्गदर्शक थे। परिचर्चा के दौरान विचार व्यक्त किए कि डॉ. अम्बेडकर का चिंतन आज भी सामाजिक समरसता, लोकतंत्र और समानता के लिए पथप्रदर्शक है। कार्यक्रम में साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों, विद्यार्थियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की उल्लेखनीय सहभागिता रही।