कैंसर का कीमो से भी सटीक इला: कार्टिसेल थैरेपी इस बीमारी के उपचार में एक क्रांतिकारी इम्यूनोथेरेपी

मेडिकल साइंस के विशेषज्ञ हर दूसरे दिन कैंसर रोग को और अधिक कारगर तरीके से डायग्नोस करने के लिए सुपर पर्सनालाइज ट्रीटमेंट पर नवाचार कर रहे हैं।

Updated On 2026-02-04 12:51:00 IST

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रायपुर। दुनियाभर के मेडिकल साइंस के विशेषज्ञ दुर्लभ कही जाने वाली कैंसर बीमारी को हराने के बेहद करीब हैं। इसके लिए मेडिकल साइंस के विशेषज्ञ हर दूसरे दिन कैंसर रोग को और अधिक कारगर तरीके से डायग्नोस करने के लिए सुपर पर्सनालाइज ट्रीटमेंट पर नवाचार कर रहे हैं। यही वजह है कि कुछ साल पहले तक विदेशों तक सीमित कैंसर के अत्याधुनिक इलाज की तकनीक अब मरीजों को उनके नजदीकी शहर व राज्यों के अस्पतालों तक पहुंच पाई है। वहीं इन नए तकनीकों और दवाईयों के नवाचार से भविष्य में कैंसर की बीमारी को रेयर डिजीज की केटेगरी से कॉमन डिजीज के रूप में उपचार को संभव बनाने मदद मिलेगी।

मेकाहारा अस्पताल के कैंसर डिपार्टमेंट के विशेषज्ञ डॉक्टर प्रदीप चंद्राकर ने बताया कि, मेडिकल साइंस विशेषज्ञों का प्रयास लगातार जारी है। इन नवाचारों में कार्टिसेल थैरेपी कैंसर के उपचार में एक क्रांतिकारी इम्यूनोथेरेपी है, जिसमें रोगी की अपनी टी-कोशिकाओं यानी प्रतिरक्षा कोशिकाओं को प्रयोगशाला में आनुवंशिक रूप से संशोधित किया जाता है। ये सुपर कोशिकाएं कैंसर को पहचानकर नष्ट कर देती हैं, जिससे यह पारंपरिक कीमोथैरेपी की तुलना में अधिक सटीक और प्रभावी उपचार बन जाता है। इसमें मरीज के रक्त से टी-कोशिकाओं को अलग किया जाता है। साथ ही लैब में इन कोशिकाओं को काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर नामक प्रोटीन विकसित करने के लिए जेनेटिक रूप से बदला जाता है। संशोधित कोशिकाओं की संख्या को प्रयोगशाला में लाखों-करोड़ों तक बढ़ाया जाता है। इन तैयार कार्टिसेल कोशिकाओं को वापस मरीज के शरीर में डाल दिया जाता है।

इन एडवांस तकनीकों ने सरल बनाई इलाज प्रक्रिया
कीमोथेरेपी तकनीक, नैनोपॉर्टिकल तकनीक, एल्ब्यूमिन बाउंड पैक्लिटैक्सेल तकनीक, लिनियर एसेलरेटर तकनीक जैसे नए अत्याधुनिक उपकरणों व मेडिसिन तकनीकों के अविष्कार ने कैंसर के इलाज को प्रभावी बनाया है।

कैंसर के नए केसेस में बढ़ोतरी लगातार जारी
कैंसर के विशेषज्ञ डॉक्टर ने बताया, तकनीकों के अविष्कार के साथ-साथ कैंसर के नए मरीजों की संख्या में भी बढ़ोतरी लगातार जारी है। इसकी मुख्य वजह असंतुलित जीवनशैली व खानपान है।

हर जिला अस्पताल में कैंसर की स्क्रीनिंग
प्रत्येक जिला अस्पताल में एनसीडी यानी नॉन कम्युनिकेबल डिजीज स्क्रीनिंग क्लीनिक में कैंसर की पहचान की जा रही है। पिछले 10 साल में कैंसर को अर्ली स्टेज में पहचान करने को लेकर लोगों में जागरूकता काफी बढ़ी है। इसमें सोशल मीडिया का योगदान भी महत्वपूर्ण रहा है, पर जानकारी के बावजूद मरीज अस्पतालों में नियमित इलाज के बजाय नॉनसाइंटिफिक पद्धति से उपचार कराने के भ्रम में पड़ जा रहे हैं।

इस प्रकार के कैंसर से सबसे अधिक प्रभावित
इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के अनुसार, कैंसर से पीड़ित भारतीयों की संख्या 2025 में 2.98 करोड़ होने का अनुमान है। आईसीएमआर की भारत में कैंसर का बोझ पर एक रिपोर्ट के अनुसार, सात कैंसर कुल बीमारी के बोझ के 40 प्रतिशत से अधिक के लिए जिम्मेदार हैं, जिसमें फेफड़े का कैंसर 10.6 प्रतिशत, स्तन कैंसर 10.5 प्रतिशत, ग्रासनली का कैंसर 5.8 प्रतिशत, मुंह का कैंसर 5.7 प्रतिशत, पेट का कैंसर 5.2 प्रतिशत, लीवर कैंसर 4.6 प्रतिशत और गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर 4.3 प्रतिशत शामिल है। 

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