सप्तऋषियों की तपोभूमि में शिव भक्ति का विराट स्वरूप: सिहावा- सोढूर बन रहा आस्था और सेवा का जीवंत तीर्थ
धमतरी जिले के नगरी- मैनपुर, देवभोग मार्ग पर स्थित सोढूर (सोनदूर) बांध क्षेत्र, जो टाइगर रिजर्व सीता नदी उदंती अभ्यारण के बफर जोन में फैला हुआ है।
मुजकुंद ऋषि का प्राचीन आश्रम
अंगेश हिरवानी- नगरी। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले की पावन धरती नगरी सिहावा जहाँ कण-कण में ऋषियों की तपस्या की स्मृतियाँ बसी हैं। शनिवार को एक बार फिर आध्यात्मिक चेतना के नए अध्याय की साक्षी बन रही है। घने वनों, शांत वादियों और रहस्यमयी पहाड़ियों से घिरी यह भूमि, जिसे सप्त ऋषियों की तपोभूमि कहा जाता है, अब श्रद्धा, प्रकृति और सामाजिक सरोकारों के अद्भुत संगम के रूप में उभर रही है।
जी हां... हम बात कर रहे नगरी विकासखंड के नगरी- मैनपुर, देवभोग मार्ग पर स्थित सोढूर (सोनदूर) बांध क्षेत्र, जो टाइगर रिजर्व सीता नदी उदंती अभ्यारण के बफर जोन में फैला हुआ है। यहाँ की ऊँची-नीची पहाड़ियाँ, कलकल बहती सोनदूर नदी और हरियाली से आच्छादित जंगल ऐसा दिव्य दृश्य रचते हैं, मानो प्रकृति स्वयं ध्यानमग्न हो। इस क्षेत्र में कदम रखते ही मन, शरीर और आत्मा तीनों को एक साथ शांति का अनुभव होता है। इसी नैसर्गिक सौंदर्य के मध्य, मुजकुंद (मचकुंद) ऋषि आश्रम के प्रवेश द्वार और सोनदूर जलाशय के समीप भगवान भोलेनाथ की लगभग 40 फीट ऊँची विराट प्रतिमा अपने अंतिम स्वरूप में आकार ले रही है।
सोनदूर जलाशय के पास स्थित है मुजकुंद ऋषि का प्राचीन आश्रम
पहाड़ियों की गोद में विराजमान यह प्रतिमा दूर से ही श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। जैसे-जैसे प्रतिमा पूर्णता की ओर बढ़ रही है, पूरे अंचल में भक्ति, उत्साह और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है। सूर्य की किरणें जब सोनदूर जलाशय की विस्तृत जलराशि पर पड़ती हैं और पानी की सतह झिलमिलाती है, तो दृश्य अलौकिक हो उठता है। मानो स्वयं प्रकृति भगवान भोलेनाथ की आरती कर रही हो। प्रतिमा के ठीक सामने ऊँचाई पर स्थित मुजकुंद ऋषि का प्राचीन आश्रम श्रद्धालुओं को आस्था की नई ऊँचाइयों तक ले जाता है। पक्की सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते समय पक्षियों की मधुर चहचहाहट, चारों ओर फैली हरियाली और नीचे बहती नदी की धारा मन को सहज ही ध्यान और साधना की अवस्था में पहुँचा देती है।
कालिया नाग का मर्दन करते हुए है भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा
इस पूरे आध्यात्मिक परिदृश्य को आसपास के खेतों में लहलहाती फसलें और परिश्रमरत किसान और भी जीवंत बना देते हैं। वहीं सामने विकसित किया गया इको पार्क इस क्षेत्र को पर्यटन की दृष्टि से भी विशिष्ट पहचान देता है। कालिया नाग का मर्दन करते भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा, बच्चों के लिए झूले और फिसलपट्टियाँ, ट्रेकिंग के लिए बनी सीढ़ियाँ तथा वन्य जीवों की प्रतिमाएँ- रोमांच और आनंद का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती हैं। यह क्षेत्र वन्य जीवन से भी समृद्ध है।
जंगल में हैं जंगली जानवर
सियार, हिरण, भालू, लकड़बग्घा और कभी-कभी तेंदुए की झलक इस बात का प्रमाण है कि यहाँ प्रकृति आज भी अपने मूल और स्वच्छ स्वरूप में जीवित है। वर्षा ऋतु में तो सोनदूर बांध का दृश्य अत्यंत मनोहारी हो उठता है- एक ओर अथाह जलराशि, दूसरी ओर विशाल पहाड़ियाँ और बीच से बहती नदी- जो हर दर्शक के मन को रोमांच से भर देती है।
21 निर्धन कन्याओं का होगा सामूहिक विवाह
इस विराट शिव प्रतिमा के निर्माण का पुण्य कार्य समाजसेवी एवं भोले बाबा के अनन्य भक्त हितेश सिंहा द्वारा कराया जा रहा है। उनकी यह पहल केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व का भी परिचायक है। आगामी 27 फ़रवरी से 1 मार्च तक पांच दिवसीय होने वाली प्राण-प्रतिष्ठा के पावन अवसर पर लगभग 21 निर्धन कन्याओं का आदर्श सामूहिक विवाह संपन्न कराया जाएगा। जहां साधु-संतों और महात्माओं की उपस्थिति में विविध धार्मिक अनुष्ठान इस आयोजन को ऐतिहासिक स्वरूप प्रदान करेंगे।
श्रद्धा, सेवा और संस्कारों का दुर्लभ संगम
यह आयोजन श्रद्धा, सेवा और संस्कारों का ऐसा दुर्लभ संगम होगा, जहाँ शिव भक्ति के साथ समाज के प्रति दायित्व का सशक्त संदेश भी दिया जाएगा। आज सिहावा–सोढूर क्षेत्र केवल एक प्राकृतिक या पर्यटन स्थल नहीं रह गया है, बल्कि आस्था, साधना, सौंदर्य और सामाजिक चेतना का जीवंत तीर्थ बनकर उभर रहा है,जो आने वाले समय में न केवल धमतरी जिले, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ की पहचान को नई ऊँचाइयों तक ले जाएगा।