सुप्रीम कोर्ट में 'दीदी' बनाम चुनाव आयोग: 'विशेष पुनरीक्षण' पर छिड़ी जंग, क्या ममता बनर्जी की दलीलों से बदल जाएगा बंगाल चुनाव का समीकरण?

ममता ने 2002 की आधार सूची पर सवाल उठाते हुए 2025 की वोटर लिस्ट पर ही चुनाव कराने और आयोग के हालिया निर्देशों को रद्द करने की मांग की है।

Updated On 2026-02-04 11:27:00 IST

ममता बनर्जी का आरोप है कि चुनाव आयोग SIR मे विसंगतियों की सूची सार्वजनिक नहीं कर रहा है।

नई दिल्ली : पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' का विवाद अब एक ऐतिहासिक मोड़ पर पहुंच गया है।

आज सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान एक अभूतपूर्व दृश्य देखने को मिल सकता है, जहां पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद एक वकील की भूमिका में जिरह करती नजर आएंगी।

ममता बनर्जी ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) से स्वयं बहस करने की अनुमति मांगी है, जिससे यह कानूनी लड़ाई अब पूरी तरह राजनीतिक और संवैधानिक वर्चस्व की जंग बन गई है।

​ऐतिहासिक कदम: खुद अपनी दलीलें पेश करेंगी मुख्यमंत्री

​ममता बनर्जी, जो स्वयं एक अधिवक्ता  हैं, ने अपनी कानूनी टीम के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में एक अंतरिम आवेदन दायर किया है।

इस आवेदन में उन्होंने 'पार्टी-इन-पर्सन' के रूप में सीधे दलीलें पेश करने की अनुमति मांगी है।

यदि कोर्ट उन्हें इसकी इजाजत देता है, तो वह संभवतः देश की पहली ऐसी सिटिंग मुख्यमंत्री होंगी जो सुप्रीम कोर्ट में राज्य का पक्ष खुद रखेंगी।

उनका तर्क है कि वह जमीनी तथ्यों से गहराई से वाकिफ हैं और निर्वाचन आयोग के आदेशों की खामियों को बेहतर ढंग से स्पष्ट कर सकती हैं।

​ECI के SIR आदेशों को रद्द करने की मांग

​ममता बनर्जी ने अपनी याचिका में चुनाव आयोग द्वारा 24 जून, 2025 और 27 अक्तूबर, 2025 को जारी किए गए एसआईआर (SIR) संबंधी सभी आदेशों और निर्देशों को पूरी तरह रद्द करने की मांग की है।

उन्होंने कोर्ट से 'परमादेश' जारी करने की अपील की है कि आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव पुरानी 2025 की मतदाता सूची के आधार पर ही कराए जाएं।

2002 की आधारभूत सूची पर सवाल: 'मतदान अधिकार को खतरा'

​ममता सरकार का सबसे कड़ा प्रहार 'सत्यापन प्रक्रिया' और उसके आधार पर है। याचिका में कहा गया है कि:

गलत आधार: एसआईआर के लिए 2002 की आधारभूत सूची पर निर्भरता पूरी तरह गलत है।

कठिन प्रक्रिया: सत्यापन की प्रक्रिया इतनी जटिल और कठिन है कि इससे वास्तविक और वैध मतदाताओं के नाम कटने का खतरा पैदा हो गया है।

वोटर डिस्प्रिविटी: बनर्जी का तर्क है कि इस 'विशेष पुनरीक्षण' की आड़ में लाखों असली मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित किया जा सकता है, जो लोकतंत्र की नींव पर हमला है।

सुनवाई के केंद्र में 1.25 करोड़ 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी'

​सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसकी अध्यक्षता CJI कर रहे हैं, इस बात पर भी गौर करेगी कि राज्य में लगभग 1.25 करोड़ मतदाताओं को 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी' की श्रेणी में रखा गया है।

ममता बनर्जी का आरोप है कि चुनाव आयोग इन विसंगतियों की सूची सार्वजनिक नहीं कर रहा है, जिससे पारदर्शिता का अभाव बना हुआ है।

आयोग की इस कार्रवाई को राज्य सरकार ने 'तानाशाही रवैया' और 'राजनीतिक भेदभाव' करार दिया है।

बंगाल चुनाव 2026 से पहले की सबसे बड़ी कानूनी जंग

​यह मामला केवल कागजों तक सीमित नहीं है। बंगाल की राजनीति में इसे 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले की 'फाइनल फाइट' के रूप में देखा जा रहा है।

जहां बीजेपी इसे घुसपैठियों की पहचान के लिए जरूरी बता रहा है, वहीं ममता बनर्जी इसे बंगाल की अस्मिता और वोटरों के अधिकार से जोड़कर सीधे मैदान में उतर गई हैं।

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