CREA की रिपोर्ट: देश का हर दूसरा शहर जहरीली हवा की चपेट में, दिल्ली-NCR की स्थिति सबसे चिंताजनक
यह समस्या तात्कालिक नहीं बल्कि उद्योगों और वाहनों से होने वाले निरंतर उत्सर्जन के कारण है।
प्रदूषण के इस स्तर में सबसे घातक PM 2.5 कणों की मौजूदगी है।
नई दिल्ली : देश में वायु प्रदूषण की स्थिति अब एक गंभीर संकट का रूप ले चुकी है। ऊर्जा और स्वच्छ वायु अनुसंधान केंद्र (CREA) के ताजा रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि भारत का लगभग हर दूसरा शहर 44 प्रतिशत खतरनाक स्तर के प्रदूषण से जूझ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, यह समस्या किसी तात्कालिक घटना की वजह से नहीं, बल्कि साल भर होने वाले निरंतर उत्सर्जन के कारण है।
विशेष रूप से दिल्ली-एनसीआर के शहरों ने प्रदूषण के मामले में सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं, जो स्वास्थ्य के लिहाज से एक बड़े खतरे की घंटी है।
एनसीआर के शहरों का बुरा हाल और शीर्ष प्रदूषित स्थान
CREA की रिपोर्ट के अनुसार, देश के शीर्ष 10 सबसे प्रदूषित शहरों में से सात अकेले दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र से हैं। साल 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, असम का बायर्नीहाट सबसे प्रदूषित शहर रहा, जबकि दिल्ली दूसरे और गाजियाबाद तीसरे स्थान पर रहे।
इसके अलावा नोएडा, गुरुग्राम, ग्रेटर नोएडा, भिवाड़ी, मुजफ्फरनगर और हापुड़ जैसे शहर भी शीर्ष 10 की सूची में शामिल हैं। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि उत्तर भारत के इन क्षेत्रों में हवा की गुणवत्ता खतरनाक स्तर तक गिर चुकी है।
निरंतर उत्सर्जन है प्रदूषण की असली वजह
विश्लेषण में यह बात स्पष्ट हुई है कि प्रदूषण के लिए पराली जलाने जैसी तात्कालिक घटनाएं नहीं, बल्कि 'संरचनात्मक समस्याएं' जिम्मेदार हैं। शहरों में साल भर होने वाले निर्माण कार्य, औद्योगिक इकाइयां और वाहनों से होने वाला निरंतर उत्सर्जन हवा को जहरीला बना रहा है।
रिपोर्ट में साल 2020 को शामिल नहीं किया गया है ताकि प्रदूषण के वास्तविक और स्थायी स्रोतों का सही आकलन किया जा सके।
यह स्पष्ट है कि जब तक इन स्थायी स्रोतों पर लगाम नहीं लगेगी, हवा साफ होना मुमकिन नहीं है।
सूक्ष्म कणों (PM 2.5) से बढ़ता स्वास्थ्य जोखिम
प्रदूषण के इस स्तर में सबसे घातक PM 2.5 कणों की मौजूदगी है। ये कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि सांस के जरिए सीधे फेफड़ों में प्रवेश कर जाते हैं और रक्त प्रवाह में मिल जाते हैं।
इनके कारण लोगों में सांस की बीमारियां, अस्थमा और हृदय संबंधी गंभीर रोग तेजी से बढ़ रहे हैं। दिल्ली में इन कणों की सांद्रता 96 माइक्रोग्राम और गाजियाबाद में 93 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज की गई है, जो स्वास्थ्य मानकों से कई गुना अधिक है।
एनसीएपी की सीमित पहुंच और विफलता
रिपोर्ट में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) की सीमाओं पर भी सवाल उठाए गए हैं। देश में प्रदूषण की गंभीरता के बावजूद, इस कार्यक्रम में केवल 130 शहरों को ही शामिल किया गया है। हैरानी की बात यह है कि देश के सर्वाधिक प्रदूषित 1787 शहरों में से केवल 67 ही इस योजना का हिस्सा हैं।
इसका मतलब है कि सरकार की यह योजना केवल 4 प्रतिशत प्रदूषित क्षेत्रों में ही सुधार के उपाय कर पा रही है, जो इस महासंकट से निपटने के लिए काफी नहीं है।