Share Market: गिरावट के बीच निवेश का मौका? निफ्टी की 25 दिग्गज कंपनियां 5 साल के पीई से नीचे
भारतीय शेयर बाजार दबाव में है और निफ्टी की 25 बड़ी कंपनियां अपने 5 साल के औसत पीई से नीचे कारोबार कर रही हैं। कमजोर वैश्विक संकेतों और विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच जानिए क्या यह गिरावट निवेश के नए अवसर पैदा कर रही है या अभी जोखिम बना हुआ है।
निफ्टी की 25 बड़ी कंपनियां अपने 5 साल के औसत पीई से नीचे कारोबार कर रही हैं।
Share Market: भारतीय शेयर बाजार इस समय दबाव के दौर से गुजर रहा है। 2025 में दुनिया के प्रमुख शेयर बाजारों की तुलना में कमजोर प्रदर्शन के बाद, 2026 की शुरुआत भी बाजार के लिए बहुत अच्छी नहीं दिख रही है। वैश्विक अनिश्चितता, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और कमजोर धारणा ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। इसी माहौल के बीच एक अहम संकेत यह सामने आया है कि निफ्टी की कम से कम 25 बड़ी कंपनियां अब अपने पिछले पांच साल के औसत पीई अनुपात से नीचे कारोबार कर रही हैं। सरल शब्दों में समझें तो पीई यानी प्राइस-टू-अर्निंग रेशियो यह बताता है कि निवेशक किसी कंपनी की एक रुपए की कमाई के बदले कितना दाम चुकाने को तैयार हैं। जब कोई शेयर अपने ऐतिहासिक औसत पीई से नीचे ट्रेड करता है, तो इसका मतलब यह होता है कि बाजार उस कंपनी के भविष्य को लेकर पहले जितना आशावादी नहीं है।
औसत पीई के नीचे ट्रेड करना या तो कम ग्रोथ की उम्मीद को दिखाता है, या फिर बढ़ते जोखिम और कमाई की अनिश्चितता को। हाल के आंकड़े बताते हैं कि बैंकिंग, आईटी, कंज्यूमर और फार्मा जैसे प्रमुख सेक्टरों की दिग्गज कंपनियों के शेयर भी दबाव में हैं। उदाहरण के तौर पर,एचडीएफसी बैंक, इंफोसिस और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी मजबूत मानी जाने वाली कंपनियां भी अपने पांच साल के औसत मूल्यांकन से नीचे आ चुकी हैं। यही स्थिति हिंदुस्तान यूनिलीवर, टाइटन और ट्रेंट जैसे उपभोक्ता आधारित शेयरों की भी है, जिन्हें लंबे समय तक स्थिर और भरोसेमंद निवेश माना जाता रहा है। इस गिरावट के पीछे एक बड़ी वजह पिछले एक साल में भारतीय बाजार का कमजोर प्रदर्शन रहा है।
जहां वैश्विक बाजारों में तेज तेजी देखने को मिली, वहीं भारत में सेंसेक्स और निफ्टी डॉलर के हिसाब से केवल 4 से 5 प्रतिशत का ही रिटर्न दे पाए। इस अंतर ने विदेशी निवेशकों को भारतीय शेयरों से दूरी बनाने के लिए प्रेरित किया। जब बड़े विदेशी फंड लगातार बिकवाली करते हैं, तो इसका सीधा असर शेयरों की कीमतों पर पड़ता है और मूल्यांकन नीचे खिसक जाता है। हालांकि, यह स्थिति अपने आप में यह नहीं कहती कि बाजार पूरी तरह सस्ता हो गया है। लेकिन इतना जरूर साफ है कि पहले जो मूल्यांकन बहुत ज्यादा महंगे लग रहे थे, उनमें अब कुछ हद तक संतुलन आया है। यही कारण है कि कई ब्रोकरेज और बाजार विशेषज्ञ इसे चयनात्मक अवसरों का दौर मान रहे हैं, न कि पूरी तरह खरीदारी का खुला निमंत्रण।
निवेशकों के लिए सबसे अहम बात अब आने वाले तिमाही नतीजे होंगे। अगर कंपनियों की कमाई उम्मीद के मुताबिक रहती है या उसमें सुधार दिखता है, तो मौजूदा मूल्यांकन लंबे समय के निवेशकों के लिए आकर्षक साबित हो सकते हैं। लेकिन अगर कमाई पर दबाव बना रहता है, तो बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। कुल मिलाकर, भारतीय शेयर बाजार इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां डर और अवसर दोनों साथ-साथ मौजूद हैं। जो निवेशक लंबी अवधि की सोच रखते हैं और जोखिम समझकर कदम बढ़ाते हैं, उनके लिए कुछ बड़े शेयर मौजूदा स्तरों पर दिलचस्प हो सकते हैं। वहीं, अल्पकालिक नजरिए से बाजार में अस्थिरता बनी रहने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
(एपी सिंह की रिपोर्ट)