नई दिल्ली : ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच जारी युद्ध ने दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल सप्लाई लाइन 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को एक सैन्य अखाड़े में तब्दील कर दिया है। ईरान द्वारा लगातार दी जा रही धमकियों और कार्गो जहाजों को निशाना बनाए जाने के बाद अब एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या ईरान इस अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर टोल या टैक्स लगा सकता है।
यह जलमार्ग न केवल ईरान बल्कि इराक, कुवैत, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों के लिए भी जीवन रेखा है।
अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून और होर्मुज पर देशों का हक
संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन (UNCLOS) के तहत किसी भी देश को अपनी तटरेखा से 12 समुद्री मील (करीब 14 मील) तक के क्षेत्र पर संप्रभुता का अधिकार प्राप्त है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अपने सबसे संकरे बिंदु पर केवल 21 मील चौड़ा है, जिसका अर्थ है कि यहाँ का पूरा जहाजरानी मार्ग ईरान और ओमान के क्षेत्रीय जलक्षेत्र के भीतर ही आता है।
कानूनन इस मार्ग की सुरक्षा और शिपिंग ट्रैफिक के सुचारू संचालन की जिम्मेदारी इन्हीं दोनों देशों की है। हालांकि, UNCLOS यह भी स्पष्ट करता है कि ईरान को अपने जलक्षेत्र से विदेशी जहाजों के 'सुरक्षित आवागमन' की अनुमति देनी होगी और वह अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए उपयोग किए जाने वाले इस मार्ग में बाधा नहीं डाल सकता।
क्या ईरान वसूल सकता है टोल? संसद में विधेयक की तैयारी
वर्तमान में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों को कोई टैक्स या टोल नहीं देना पड़ता है, क्योंकि यह एक प्राकृतिक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग है। टोल या शुल्क आमतौर पर स्वेज नहर या पनामा नहर जैसे मानव निर्मित जलमार्गों पर लगाए जाते हैं। हालांकि, 'फोर्ब्स' की रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी संसद में एक ऐसा विधेयक लाने की तैयारी चल रही है जो ईरान को इस मार्ग से टोल वसूलने की अनुमति देगा। ईरान का तर्क है कि वह जहाजों को सुरक्षा प्रदान करता है और अमेरिका से मिल रही धमकियों के खिलाफ इस 'सुरक्षा' की लागत की भरपाई टोल के माध्यम से की जानी चाहिए।
वैश्विक तेल आपूर्ति पर संकट और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की आशंका
दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति इसी 21 मील चौड़े संकरे रास्ते से होकर गुजरती है। यदि ईरान यहाँ टोल लगाने या किसी प्रकार का सैन्य हस्तक्षेप करने की कोशिश करता है, तो इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन माना जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में अमेरिका और अन्य बड़ी सैन्य शक्तियां सीधे हस्तक्षेप करने के लिए तैयार होंगी, जिससे यह संघर्ष एक बड़े वैश्विक युद्ध का रूप ले सकता है। फिलहाल तनाव की वजह से इस मार्ग से जहाजों का ट्रैफिक 90% तक गिर गया है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में हाहाकार मचा हुआ है।
ईरान का दोहरा रुख: समझौता या संप्रभुता का इस्तेमाल
ईरान ने 1982 में UNCLOS संधि पर हस्ताक्षर तो किए थे, लेकिन उसकी संसद ने इसे कभी अनुमोदित नहीं किया। यही वजह है कि ईरान समय-समय पर अपनी संप्रभुता का हवाला देकर इस जलमार्ग को बंद करने या वहां कड़े नियम लागू करने की धमकी देता रहता है।
दूसरी ओर, भारत जैसे मित्र देशों के लिए ईरान ने हाल ही में अपने रुख में नरमी दिखाई है और भारतीय तेल टैंकरों को इस मार्ग से सुरक्षित गुजरने की विशेष छूट दी है, जो भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है।