अमेरिका-ईरान के बीच समझौता 5 vs 20 साल की शर्त पर अटक गया। ट्रम्प के फैसले के बाद होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ा सैन्य तनाव, जानें पूरा मामला।

नई दिल्ली/तेहरान/वॉशिंगटन। दुनिया की सबसे अहम समुद्री व्यापारिक लाइफलाइन माने जाने वाले होर्मुज स्ट्रेट में एक बार फिर तनाव चरम पर पहुंच गया है। अमेरिका और ईरान के बीच चली गुप्त कूटनीतिक कोशिशें नाकाम हो गई हैं, जिसके बाद हालात तेजी से बिगड़ते नजर आ रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने वैश्विक राजनीति के साथ-साथ तेल बाजार को भी चिंता में डाल दिया है।

सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान में हुई बैकडोर बातचीत में ईरान ने समझौते की दिशा में एक अहम प्रस्ताव रखा था। उसने पांच साल तक यूरेनियम संवर्धन रोकने की पेशकश की और इसके बदले अमेरिका से प्रतिबंधों में राहत की उम्मीद जताई। यह प्रस्ताव एक मध्य रास्ता माना जा रहा था, लेकिन यहीं बातचीत अटक गई।

अमेरिका इस प्रस्ताव से संतुष्ट नहीं हुआ। उसका मानना था कि पांच साल की अवधि बहुत कम है और इससे भविष्य में ईरान फिर से अपने परमाणु कार्यक्रम को तेज कर सकता है। इसी वजह से अमेरिकी पक्ष कम से कम 20 साल तक संवर्धन रोकने की शर्त पर अड़ा रहा। दोनों देशों के बीच यही मतभेद समझौते की राह में सबसे बड़ी बाधा बन गया।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। इसके तुरंत बाद अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट में सैन्य सख्ती बढ़ा दी। अमेरिकी नौसेना ने ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी शुरू कर दी और ईरान से जुड़े जहाजों की आवाजाही पर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी, हालांकि अन्य देशों के जहाजों को गुजरने की अनुमति दी गई है।

इस कार्रवाई पर ईरान ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (Islamic Revolutionary Guard Corps) ने चेतावनी दी कि वह नए तरीके से जवाब देगा। सैन्य प्रवक्ता इब्राहिम जोलफघारी ने साफ कहा कि अगर दबाव बढ़ाया गया तो फारस की खाड़ी और ओमान सागर का कोई भी बंदरगाह सुरक्षित नहीं रहेगा। इस बयान के बाद क्षेत्र में तनाव और अधिक बढ़ गया है।

होर्मुज स्ट्रेट की अहमियत इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव सीधे वैश्विक बाजार और भारत जैसे तेल आयातक देशों पर असर डाल सकता है।

इस पूरे विवाद की जड़ एक ही है यूरेनियम संवर्धन रोकने की अवधि को लेकर गहरी असहमति। यही असहमति अब कूटनीतिक विफलता में बदल चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जल्द कोई समाधान नहीं निकला, तो यह तनाव बड़े सैन्य टकराव का रूप भी ले सकता है, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ना तय है।