वर्ष 2016 में लागू हुआ रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट, 2016 यानी RERA कानून घर खरीदारों को बिल्डरों की मनमानी से बचाने और रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से बनाया गया था।
लेकिन लगभग एक दशक बाद, देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने इसकी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि कानून उपभोक्ताओं को राहत देने में असमर्थ है, तो इसे बंद कर देना चाहिए।
आरोप है कि लाखों शिकायतें लंबित हैं, कब्जा समय पर नहीं मिल रहा और क्रियान्वयन में भारी कमी है। अदालत की तल्ख टिप्पणी कि यह व्यवस्था सेवानिवृत्त नौकरशाहों का “पुनर्वास केंद्र” बन गई है ने बहस को और तेज कर दिया है।
सबसे बड़ा सवाल यही है-
क्या RERA अपने मूल उद्देश्य से भटक चुका है? क्या इसे सुधारने की जरूरत है या बंद कर देना चाहिए?
इसी गंभीर मुद्दे पर हरिभूमि और INH के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी के साथ विशेष “चर्चा” में कानून, रियल एस्टेट और न्याय व्यवस्था से जुड़े विशेषज्ञों ने खुलकर अपनी राय रखी।
इस खास पेशकश में शामिल हुए-
- न्यायमूर्ति आदित्य मित्तल – पूर्व न्यायाधीश, हाई कोर्ट
- दीपक अग्रवाल - CREDAI के सदस्य
- उत्कर्ष सिंह राजपूत – अधिवक्ता
- रमेश अग्रवाल – अध्यक्ष, रियल स्पेसेस










