बनारसी पान अपनी कोमलता और खास स्वाद के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इसमें मुख्य रूप से मगही पत्ते का उपयोग किया जाता है, जिसे खास तरीके से उपचारित किया जाता है ताकि वह मुंह में घुल जाए।

वाराणसी: ​बनारसी पान सिर्फ एक जायका नहीं, बल्कि एक मुकम्मल अहसास है। इसके पत्ते की नरमी से लेकर इसे बनाने के सलीके तक, हर कदम पर एक इतिहास छिपा है। आइए जानते हैं कि यह पान कहां से आता है और कैसे इसने वक्त के साथ अपना रूप बदला है।

​मगही पत्ते का रहस्य: कहां से आता है यह खास पत्ता और क्या है इसकी पैदावार? 
बनारसी पान की रूह इसका पत्ता है, जिसे 'मगही' कहा जाता है। रोचक बात यह है कि बनारसी पान का पत्ता खुद बनारस में नहीं उगता। इसकी मुख्य पैदावार बिहार के मगध क्षेत्र गया, नवादा और औरंगाबाद में होती है। मगध की मिट्टी और जलवायु इस पत्ते को एक खास नरमी और सफेदी प्रदान करती है। वहां से आने के बाद बनारस के कारीगर इसे खास नमी वाले कमरों में रखकर 'पकाते' हैं। इसी प्रक्रिया के बाद यह पत्ता इतना मुलायम हो जाता है कि मुंह में जाते ही घुल जाता है।

​इतिहास के झरोखे से: कैसे हुई थी पान की शुरुआत? 
पान का जिक्र हमारे प्राचीन ग्रंथों और आयुर्वेद में 'ताम्बूल' के रूप में मिलता है। माना जाता है कि मुगल काल के दौरान पान को शाही विलासिता और तहजीब का हिस्सा बनाया गया। नूरजहाँ ने सबसे पहले पान में कत्था और चूने के साथ सुगंधित मसालों का प्रयोग शुरू किया था।

धीरे-धीरे यह काशी की गलियों में पहुँचा और यहाँ की आबोहवा में रच-बस गया। आज बनारसी पान अपनी विशिष्ट 'किमाम' और 'कत्था मथने' की कला के कारण दुनिया में नंबर एक माना जाता है।

​शुभता का प्रतीक: शादी-विवाह और मांगलिक कार्यों में पान का महत्व 
भारतीय संस्कृति में पान को 'अष्टमंगल' वस्तुओं में गिना जाता है। पुराने समय से ही शादी-विवाह के कार्ड के साथ सुपारी और पान का पत्ता भेजना निमंत्रण का हिस्सा रहा है। विवाह के मंडप में गौरी-गणेश की पूजा हो या मेहमानों का स्वागत, पान के बिना हर रस्म अधूरी मानी जाती है।

शादी के भोज के बाद मेहमानों को सलीके से सजा हुआ 'बीड़ा' खिलाना सम्मान और सत्कार का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। इसे सौभाग्य और संपन्नता से जोड़कर देखा जाता है।

​स्वाद के अनगिनत अवतार: कितने तरह के होते हैं बनारसी पान? 
बनारस की अड़ी पर आपको पान की एक पूरी रेंज मिलती है, जो हर किसी के मिजाज के हिसाब से तैयार की जाती है:

सादा पान: चूना, कत्था और सुपारी का पारंपरिक मेल।

मीठा पान: गुलकंद, सौंफ, चेरी और नारियल के बुरादे से भरपूर।

किमाम वाला पान: यह खास तौर पर तेज खुशबू और कड़क जायके के शौकीनों के लिए होता है।

जर्दा पान: तंबाकू के शौकीनों के लिए।

गिलौरी: जिसमें पान के पत्ते को खास त्रिकोणीय आकार (बीड़ा) देकर चांदी के वर्क से सजाया जाता है।

​बदलता दौर और 'फ्यूजन पान': चॉकलेट और आइसक्रीम पान का बढ़ता क्रेज 
आज की युवा पीढ़ी के बीच पान का क्रेज खत्म नहीं हुआ, बल्कि इसने नया रूप ले लिया है। अब मार्केट में चॉकलेट पान, आइसक्रीम पान और फायर पान जैसे विकल्पों की धूम है।

चॉकलेट पान: इसमें पान के अंदर डार्क चॉकलेट और बाहर से चॉकलेट की कोटिंग होती है, जो बच्चों और युवाओं की पहली पसंद है।

आइसक्रीम पान: ठंडी-ठंडी मलाई और पान के मसालों का यह फ्यूजन गर्मियों में खूब पसंद किया जाता है।

स्ट्रॉबेरी और मैंगो पान: फलों के फ्लेवर वाले पान भी अब शादियों के बुफे की शान बढ़ा रहे हैं।

​पान का सामाजिक महत्व: मेल-मिलाप और तहजीब का प्रतीक 
बनारस में पान सिर्फ भोजन के बाद का माउथ फ्रेशनर नहीं है, बल्कि यह यहाँ की 'तहजीब' का हिस्सा है। घाटों पर होने वाली चर्चा हो या अस्सी की अड़ी, पान के बिना हर बातचीत अधूरी मानी जाती है।

मेहमानों का स्वागत पान से करना बनारसी संस्कृति की परंपरा रही है। यहाँ 'सादा पान' और 'मीठा पान' के अलावा 'किमाम' वाला पान भी काफी मशहूर है, जो अपने तीखे और मीठे के संतुलित मेल के लिए जाना जाता है।

बनारसी पान की सबसे बड़ी खासियत: मुंह में जाते ही घुल जाने वाला जादू 
बनारसी पान की सबसे बड़ी खूबी इसका 'पत्ता' है। यहाँ मुख्य रूप से 'मगही' पत्ते का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे बिहार के गया क्षेत्र से मंगाया जाता है। इस पत्ते को खास तरीके से संसाधित किया जाता है, जिससे यह इतना नरम हो जाता है कि मुंह में रखते ही मक्खन की तरह घुल जाता है।

इसे बनाने का शिल्प 'कत्था' लगाने की तकनीक में छिपा है। बनारस के कारीगर कत्थे को कई दिनों तक पानी में भिगोकर और मथकर उसे 'ठंडा' करते हैं, जिससे पान का स्वाद और रंग निखर कर आता है।