“बनारस में न होते तो नामवर नामवर न होते।”
काशीनाथ सिंह ने कहा कि नामवर सिंह को समझना है तो उनकी कक्षाओं को याद करना होगा। हालात यह थे कि क्लासरूम में जगह कम पड़ जाती थी। विद्यार्थी खिड़कियों और दरवाजों से खड़े होकर व्याख्यान सुनते थे। उन्होंने भावुक होते हुए कहा- “मेरे लिए नामवर वह फूल हैं जो अब नहीं हैं, लेकिन उनकी सुगंध आज भी जीवन में है।”
आलोचना सिर्फ साहित्य नहीं, जीवन की भी
उद्घाटन वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने कहा कि नामवर जी की आलोचना साहित्य की श्रेष्ठता को पहचानने का सतत प्रयास थी। उनके अनुसार श्रेष्ठ रचना क्षण की सृष्टि करती है, वक्तव्य नहीं देती।
बीज वक्तव्य में कथाकार अखिलेश ने कहा कि हिन्दी की लगभग हर बहस में नामवर सिंह उपस्थित रहे। उन्होंने व्याख्यान को एक कला के रूप में स्थापित किया और अपभ्रंश से लेकर समकालीन साहित्य तक नई व्याख्याएँ दीं।
मुख्य अतिथि समाजविज्ञानी आनंद कुमार ने कहा कि दिल्ली की कोई भी साहित्यिक गोष्ठी नामवर सिंह के बिना अधूरी मानी जाती थी। उन्होंने कहा- “वे दंगल की तरह बहस करते थे, लेकिन विवेक और तर्क के साथ।”
प्रवासी साहित्यकार दिव्या माथुर ने याद किया कि नामवर सिंह जितना अच्छा लिखते थे, उतना ही प्रभावशाली बोलते भी थे।
विभाग की ओर से विशेष आयोजन
हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ अनूप ने कहा कि नामवर सिंह ने आलोचना की परिभाषाएँ बदल दीं। प्रो. मनोज कुमार सिंह ने उन्हें जीवन की आलोचना करने वाला चिंतक बताया।
कार्यक्रम का संचालन प्रो. नीरज खरे और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. प्रभाकर सिंह ने किया। देशभर से आए विद्वानों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की बड़ी उपस्थिति ने आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया।










