लखनऊ: पश्चिम एशिया में ईरान-इजरायल के बीच जारी युद्ध का सीधा प्रहार अब उत्तर प्रदेश के कृषि निर्यात पर पड़ा है। प्रदेश के गेहूं और उससे बने उत्पादों (आटा, मैदा, सूजी) के करीब 1600 से 1700 करोड़ रुपये के निर्यात सौदे रद्द होने के कगार पर पहुंच गए हैं।
साल 2022 में लगे प्रतिबंध के बाद, फरवरी 2026 में ही केंद्र सरकार ने निर्यात के दरवाजे फिर से खोले थे, लेकिन महज कुछ ही हफ्तों में वैश्विक युद्ध ने इन व्यापारिक उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
तीन साल का लंबा इंतजार और सरकार की नई नीति
भारत सरकार ने पर्याप्त स्टॉक और बेहतर उत्पादन को देखते हुए फरवरी 2026 में आंशिक रूप से निर्यात की अनुमति दी थी। सरकार का लक्ष्य 25 लाख मीट्रिक टन गेहूं और 5 लाख मीट्रिक टन गेहूं उत्पादों का निर्यात करना था, ताकि किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर कीमत मिल सके। उत्तर प्रदेश, जो देश के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्यों में से एक है, इस नीति का सबसे बड़ा लाभार्थी बनने वाला था।
शिपिंग लागत में 50% का उछाल और बीमा का बोझ
खाड़ी देशों मे जैसे यूएई, सऊदी अरब, ओमान, कुवैत और कतर को होने वाला निर्यात अब समुद्री मार्ग पर बढ़ते खतरों के कारण अनिश्चितता में घिर गया है।
शिपिंग संकट: युद्ध के कारण समुद्री जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे शिपिंग लागत में 40 से 50 फीसदी की भारी बढ़ोतरी हुई है।
बीमा प्रीमियम: समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम को देखते हुए 'युद्ध जोखिम बीमा' का प्रीमियम दोगुना हो गया है।
इन अतिरिक्त खर्चों के कारण भारतीय गेहूं अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगा हो गया है, जिससे खरीदार अपने सौदे वापस ले रहे हैं।
यूपी की आटा-मैदा मिलों को लगा तगड़ा झटका
उत्तर प्रदेश में आटा-मैदा मिलों का एक विशाल नेटवर्क है, जिसका गेहूं उत्पादों के कुल निर्यात में करीब 25 से 35 प्रतिशत का योगदान है।
प्रभावित जिले: कानपुर, आगरा, अलीगढ़, गाजियाबाद, मेरठ और बरेली सहित प्रदेश के कम से कम 20 जिलों की मिलों को इस व्यापारिक संकट का सीधा असर झेलना पड़ रहा है।
यूपी रोलर मिल्स एसोसिएशन के अध्यक्ष दीपक बजाज के अनुसार, निर्यात बाजार खुलने से मिलों को नई ऊर्जा मिली थी, लेकिन अब शिपिंग संकट ने पूरे उद्योग को गहरे संकट में डाल दिया है।