Cultural Event: समाज में कन्याभ्रूण हत्या की कुरीति और संवेदनशीलता को दर्शाते दृश्यों ने दर्शकों को भाव विभोर कर दिया। कविताओं से सामाजिक जागरूकता का संदेश देती डॉ वीणा सिन्हा की कविताओं पर आधारित लघु नाटक ‘तुम फिर भी जीना लड़की‘ का मंचन शुक्रवार को शिवाजी नगर स्थित दुष्यंत कुमार पांडुलिपि स्मारक संग्रहालय में हुआ। इस अवसर पर डॉ सिन्हा की चयनित कविताओं के रचना समय द्वारा प्रकाशित पुस्तिका के विमोचन के साथ श्री निरंजन श्रोत्रिय, श्री राग तेलंग एवं सुश्री अपर्णा पात्रीकर के काव्य पाठ ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कन्याभ्रूण हत्या कुरीति पर छोड़े सवाल
"माएं, दादियां और नानियां, जब तक कोख में बेटियां हैं और बेटियों से नफरत है मांओं को…" नाटक की यह पंक्तियां जब मंच से चित्कार कर कही गई तो दर्शकों में एक सिहरन पैदा होती है। कन्या भ्रूण हत्या की थीम पर यह नाटक अपने आसपास के सारे आस्पेक्ट को समेटे बार बार कहता है। 'तुम फिर भी जीना लड़की' शासकीय चिकित्सा सेवा से सेवानिवृत्त डॉ वीणा सिन्हा की कविताओं की पंक्तियों को किरदारों ने मंच पर बखूबी प्रस्तुत किया।
नन्हीं कलाकार लावण्या के अभिनय को भी दर्शकों ने खूब सराहा। स्वर रंग आर्ट एंड कल्चरल सोसाइटी द्वारा इसकी प्रस्तुति दी गई। अंतर्राष्ट्रीय सितार वादिका सुश्री स्मिता नागदेव के सजीव सितार वादन एवं राहुल शर्मा ‘राहुल्य’ के निर्देशन में नाटक का मंचन हुआ। मंच पर प्राची चौकसे, सौम्या श्रीवास, खुशी विजयवर्गीय एवं गीतांशी के अभिनय को दशकों ने पसंद कर मंचन को प्रभावी बताया।

काव्य पाठ ने किया मंत्र मुग्ध, पुस्तिका का हुआ विमोचन
वरिष्ठ साहित्यकार हरि भटनागर के द्वारा डॉ वीणा सिन्हा की चयनित एवं संपादित कविताओं की पुस्तिका विमोचन किया गया। कार्यक्रम में प्रबुद्ध कवि श्री निरंजन श्रोत्रिय, श्री राग तेलंग एवं सुश्री अपर्णा पात्रीकर ने महिला मुद्दों पर आधारित अपनी रचनाओं का पाठ किया। श्री तेलंग ने दृश्य में स्त्री का प्रवेश, पाखी भी रोते हैं और अंतरलय कविता में समाज व सभ्यता के निर्माण, सामाजिक संस्कृति में स्त्री की बुनियादी भूमिका,स्त्री के उदास जीवन के प्रति संवेदनाओं एवं मौलिक स्वभाव के अनुरूप ही जीवन जीने के भाव आधारित कविताओं का पाठ किया।
युवा महिला गजलकार सुश्री अपर्णा पात्रीकर डॉ सिन्हा कविता आग से निकलकर मां तैरेगी नदी की तलहटी में और गजल सवाली हूं मुझे बस एक झलक पाना जरूरी है और रगे जां में सांस की तरह बह कि लहू की तरह बदन में आ का पाठ किया। वरिष्ठ कवि श्री निरंजन श्रोत्रिय ने पारिवारिक संदर्भों में स्त्री की उपस्थिति पर अपनी कविता ‘जरूरत भी नहीं है’ के पाठ पर श्रोताओं को स्त्री के दैनंदिन जीवन में बारे में दिशा बोध करवाया। श्री श्रोत्रिय की कविता लेडीज़ रुमाल, द करवा चौथ, स्वप्न में समुद्र, औरत और बिटिया के पाठ से स्त्रियों के मुद्दों पर प्रकाश कार्यक्रम का संचालन डॉ विशाखा राजुरकर एवं स्वागत उद्बोधन श्रीमती करुणा राजुरकर द्वारा किया गया।










