भोपाल। मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली में अनियमितताओं के कारण कई सरकारी कॉलेजों को विश्वविद्यालयों में जमा किए जाने वाले संबद्धता शुल्क के लिए समय पर आर्थिक सहायता नहीं मिल पा रही है। पहले यह व्यवस्था नियमित थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भुगतान में असमानता देखने को मिली है। इसका सीधा असर कॉलेजों की वित्तीय स्थिति और शैक्षणिक गतिविधियों पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बारे में जल्द स्पष्ट और समान नीति नहीं बनाई गई, तो यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है।
संबद्धता के लिए देना पड़ता है शुल्क
बता दें कॉलेजों को किसी विश्वविद्यालय से शैक्षणिक संबद्धता (Affiliation) पाने के लिए शुल्क देना पड़ता है। यह शुल्क विश्वविद्यालय के साथ कॉलेज के औपचारिक संबंध और मान्यता होती है। कॉलेज सरकारी है, तो उच्च शिक्षा विभाग या राज्य सरकार इसकी कुछ राशि सब्सिडी के रूप में प्रदान करता है। निजी कॉलेज पूरी राशि खुद जमा करते हैं। उच्च शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली में अनियमितता के कारण संबद्धता शुल्क के भुगतान में दिक्कत आ रही है।
पेमेंट में असमानता से कॉलेजों में असंतोष
स्थिति यह है कि कुछ कॉलेजों को पूरा भुगतान मिल जाता है, जबकि कई संस्थानों को आंशिक राशि ही मिलती है या कुछ सालों तक कोई भुगतान नहीं होता। विभाग के पास इस विषय में कोई ठोस और पारदर्शी नीति नहीं है। किस कॉलेज को कितनी राशि दी जाएगी, इसका कोई स्पष्ट मापदंड नहीं होने से कॉलेज प्रशासन में असंतोष पैदा हो गया है।
बजट कटौती के चलते पढ़ाई प्रभावित
कॉलेज अधिकारियों का कहना है कि विश्वविद्यालयों द्वारा संबद्धता शुल्क में लगातार वृद्धि की जा रही है, लेकिन विभाग आनुपातिक सहायता नहीं दे रहा। इसके कारण कॉलेजों को अपनी अन्य जरूरतों के लिए निर्धारित बजट में कटौती करनी पड़ रही है, जिससे शिक्षा और शोध से जुड़ी गतिविधियों पर असर पड़ सकता है। इससे सीधे छात्रों का भविष्य प्रभावित हो रहा है।
हमीदिया को मिली कम सहायता
हमीदिया कॉलेज का मामला इस समस्या को ठीक तरह से स्पष्ट करता है। कॉलेज ने विश्वविद्यालय में लाखों रुपए का शुल्क जमा किया, लेकिन विभाग से कालेज को अपेक्षाकृत बहुत कम राशि प्राप्त हुई। कई सालों तक या तो सहायता नगण्य रही या बिल्कुल नहीं मिली। इसका सीधा असर कॉलेज की वित्तीय योजना और संचालन पर पड़ रहा है।
शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ रहा असर
पहले विभाग अलग से बजट जारी करता था, जिससे कॉलेजों को राहत मिलती थी। अब यह प्रक्रिया कमजोर हो गई है और भुगतान असमान रूप से किया जा रहा है। विभाग के अधिकारी इस मामले की जांच करने और सुधार के लिए कदम उठाने का आश्वासन दे रहे हैं। इस स्थिति से उच्च शिक्षा संस्थानों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। शिक्षा की गुणवत्ता पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है।










