मुरैना में 12वीं के छात्र ने रिजल्ट के तनाव में जान दे दी। जानें पूरी घटना, पुलिस जांच और विशेषज्ञों की अपील-परीक्षा में असफलता अंत नहीं है, छात्रों को मानसिक सहारे की होती है जरूरत।

मुरैना। बोर्ड परीक्षाओं के नतीजे जहां कई छात्रों के लिए खुशी लेकर आए, वहीं कुछ के लिए गहरी निराशा का कारण बन गए। जिले के अंबाह में बोर्ड परीक्षा में फेल होने के बाद 12वीं के छात्र ने खुद को गोली मारकर खुदकुशी कर ली। यह घटना माताबसैया थाना क्षेत्र के कोतवाल डैम के पास हुई। मृतक की पहचान अंबाह शिक्षा विभाग में कार्यरत बाबू शैलेंद्र दंडोतिया के पुत्र ऋतिक दंडोतिया (20) के रूप में की गई है। प्राथमिक जानकारी के अनुसार, ऋतिक ने 12वीं की बोर्ड परीक्षा दी थी और वह सभी विषयों में फेल था। इसी बात से आहत होकर उसने खुदकुशी करने जैसा खौफनाक कदम उठाया। 

सभी विषयों में फेल था ऋतिक
बताया जाता है कि रिजल्ट की जानकारी मिलने के बाद वह अपनी स्कूटी से कोतवाल डैम के किनारे पहुंचा और अवैध कट्टे से अपनी दाहिनी कनपटी पर गोली मारकर खुदकुशी कर ली। बाद में किसी ने डैम के पास शव पड़े होने की सूचना माताबसैया थाना पुलिस को दी। पुलिस मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए मुरैना भिज दिया। पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया। परिजनों ने बताया कि परिणाम आने के बाद जब उसने देखा कि वह सभी विषयों में फेल है, तो वह परेशान हो गया। उसने अपनी मानसिक दशा किसी के साथ साझा नहीं की।  

सदमे में परिवार, घर में मातम पसरा
इस घटना ने परिजनों को ही नहीं, स्थानीय लोगों को भी झकझोर कर रख दिया है।  थाना प्रभारी विवेक सिंह तोमर के मुताबिक, शुरुआती जांच में सामने आया है कि छात्र रिजल्ट को लेकर गहरे मानसिक दबाव आ गया था। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और विस्तृत जांच शुरू कर दी है। पुलिस ने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद स्थिति और स्पष्ट होगी। इस हादसे के बाद से परिवार गहरे सदमे में है और घर में मातम पसरा हुआ है। परिजनों ने बताया कि उसने ऐसा बिल्कुल आभास नहीं होने दिया कि वह मानसिक रूप से इतना टूट चुका है।  

असफलता अंत नहीं, जरूरत समझ व सहारे की 
यह घटना समाज के लिए एक गंभीर संदेश छोड़ती है कि परीक्षा में असफल होना जीवन का अंत नहीं होता। छात्रों के पास आगे बढ़ने के कई मौके होते हैं, जिनमें दोबारा परीक्षा देना भी शामिल है। जरूरत इस बात की है कि छात्रों को भावनात्मक सहारा दिया जाए और उन्हें यह समझाया जाए कि एक रिजल्ट उनकी पूरी जिंदगी तय नहीं करता। माता-पिता और शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दें और किसी भी तरह के दबाव को समय रहते पहचानें,।