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केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के विरोध में छतरपुर-पन्ना में हजारों ग्रामीण ‘चिता प्रदर्शन’ कर रहे हैं। जानें क्यों बढ़ रहा है यह आंदोलन, क्या हैं आरोप और कैसे यह मुद्दा अब बड़ा राजनीतिक विवाद बनता जा रहा है।

छतरपुर। मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों में केन-बेतवा लिंक परियोजना के खिलाफ विरोध प्रदर्शन लगातार तेज होता जा रहा है। जहां एक ओर समाज का एक वर्ग गर्मी के मौसम में आरामदायक जीवन जी रहा है, वहीं दूसरी ओर आदिवासी समुदाय तपती धूप में अपनी जमीन, जंगल, नदी और संस्कृति को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। इस आंदोलन का शनिवार को तीसरा दिन है, जिसमें हजारों लोग चिता प्रदर्शन के जरिए अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं।

आंदोलन में बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे शामिल
इस प्रदर्शन में करीब 5 हजार आदिवासी, किसान, महिलाएं और बच्चे शामिल हैं, जो प्रतीकात्मक रूप से चिताओं पर लेटकर अपना विरोध जता रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्हें या तो न्याय दिया जाए या फिर मृत्यु। हमें न्याय दो या मौत दो जैसे नारों के साथ वे सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। प्रदर्शन स्थल धोधन बांध निर्माण क्षेत्र के पास बनाया गया है, जहां लोगों ने अस्थायी टेंट लगाकर रहना शुरू कर दिया है। 

ग्रामीण बोले आजीविका पर पड़ेगा असर  
प्रदर्शनकारी पिछले तीन दिनों से वहीं डटे हुए हैं और अपनी मांगों को लेकर लगातार आंदोलन कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह परियोजना उनके जीवन और आजीविका पर सीधा असर डालेगी, जिससे उनका अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। इस आंदोलन का नेतृत्व जय किसान संगठन के अमित भटनागर कर रहे हैं। उन्होंने इस विरोध को लोकतंत्र की जीत बताया है और कहा है कि यह आंदोलन दमन के खिलाफ खड़ा हुआ है। प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन पर गंभीर आरोप भी लगाए हैं। 

इस मुद्दे ने सियासी विवाद का रूप लिया
उनका कहना है कि पुलिस और वन विभाग के अधिकारी उन्हें भोजन, पानी और अन्य जरूरी चीजें मिलने से रोक रहे हैं। इसके अलावा, स्थानीय ग्रामीणों और दुकानदारों पर भी दबाव बनाने के आरोप लगाए गए हैं। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि प्रशासन उन्हें किसी भी तरह की मदद न देने के लिए लोगों को धमका रहा है। इन परिस्थितियों में भी प्रदर्शनकारी अपने आंदोलन पर डटे हुए हैं और पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। इस मुद्दे ने अब बड़े राजनीतिक मुद्दे का रूप ले लिया है, जहां एक तरफ विकास परियोजना है, तो दूसरी ओर स्थानीय लोगों के अधिकार और अस्तित्व का संघर्ष है।

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