धार स्थित भोजशाला के धार्मिक स्वरूप को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में सुनवाई के दौरान बहस दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई। हिंदू पक्ष ने अदालत में न सिर्फ ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य पेश किए, बल्कि इस्लामिक कानून (हदीस) का हवाला देकर भी अपनी दलील मजबूत करने की कोशिश की। वकील ने तर्क दिया कि भोजशाला मूल रूप से मंदिर था और दोनों धर्मों के सिद्धांतों के आधार पर इस पर दावा स्पष्ट होना चाहिए। अब इस मामले में आगे की सुनवाई और अदालत का फैसला बेहद अहम माना जा रहा है।
यहां मंदिर, इस लिए मुस्लिम पक्ष छोड़े दावा
वकील ने तर्क दिया कि इस्लाम में किसी की जमीन पर जबरन कब्जा करके धार्मिक स्थल बनाना उचित नहीं माना जाता। जब इस बात के प्रमाण हैं कि यह एक हिंदू मंदिर था, तो मुस्लिम पक्ष को इसपर दावा छोड़ देना चाहिए। उन्होंने हिंदू धार्मिक मान्यताओं का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई स्थान एक बार मंदिर के रूप में स्थापित हो जाए, तो उसका स्वरूप हमेशा मंदिर ही माना जाता है। वकील ने यह भी जोड़ा कि इन दोनों धार्मिक दृष्टिकोणों को देखें तो भोजशाला का मूल स्वरूप मंदिर ही प्रतीत होता है। इस तरह दोनों पक्षों के धार्मिक सिद्धांतों को आधार बनाकर अपनी दलील को मजबूत करने का प्रयास किया गया।
ऐतिहासिक दस्तावेज और राजा भोज का संदर्भ
बहस के दौरान पुराने राजपत्रों और राजा भोज से जुड़े ग्रंथों का भी उल्लेख किया गया। बताया गया कि भोजशाला में मौजूद शिलालेख इस बात के संकेत देते हैं कि यहां सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियां होती थीं। विशेष रूप से वसंत पंचमी के अवसर पर यहां नाटकों का आयोजन किया जाता था, जिसका उल्लेख अनेक ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है। याचिकाकर्ता की ओर से ब्रिटिश म्यूजियम में रखी वाग्देवी की प्रतिमा का भी जिक्र किया गया। दलील दी गई कि इस मूर्ति पर राजा भोज का नाम अंकित है और इसे भोजशाला से ले जाया गया था।
एएसआई सर्वे में मिलीं देवी-देवताओं की मूर्तियां
इसके साथ ही यह भी कहा गया कि एएसआई के सर्वे में यहां से बड़ी संख्या में देवी-देवताओं की मूर्तियां और कलाकृतियां मिली हैं। इन सभी तर्कों के आधार पर हिंदू पक्ष ने अदालत से मांग की है कि उन्हें भोजशाला में पूरे समय पूजा करने की अनुमति दी जाए। बुधवार को याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी की ओर से बहस पूरी हो गई है। अब गुरुवार को अन्य याचिकाकर्ता अंतरसिंह की ओर से कोर्ट में दलीलें पेश की जाएंगी।यह मामला धार्मिक, ऐतिहासिक और कानूनी पहलुओं से जुड़ा हुआ है, जिस पर अदालत का अंतिम निर्णय काफी अहम माना जा रहा है।