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योगेंद्र शर्मा, चंडीगढ़: सूबे में हरियाणा विधानसभा चुनावों की उल्टी गिनती की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन हरियाणा की सत्ताधारी पार्टी को भी अहसास नहीं था कि इतनी जल्दी आचार संहिता की तलवार लटकने जा रही है। इस तरह एकाएक आचार संहिता लागू हो जाने को लेकर खुद सूबे के मुख्यमंत्री नायब सैनी और उनकी टीम तैयार नहीं थी। आचार संहिता के तड़के ने सौगातों का स्वाद बिगाड़ने का काम किया। दूसरी तरफ जो घोषणाएं सरकार द्वारा की गई हैं, उनको लेकर भी कई तरह के संशय खड़े हो गए हैं।

सीएम को नहीं था आभास

16 अगस्त की सुबह मुख्यमंत्री की पीसी सुबह नौ बजे बुलाई गई थी, साथ ही कैथल व अन्य स्थानों पर कार्यक्रम होना कारण बताया गया था। इस दौरान उन्होंने जमकर कांग्रेस को कोसा व दर्जनभर से ज्यादा सवालों का जवाब मांगा था। उस दिन भी मुख्यमंत्री को आभास नहीं था और आत्मविश्वास से भरे सीएम ने कहा कि वक्त पर चुनाव होंगे, अभी समय लगेगा। कुल मिलाकर उसी दिन तारीखों का ऐलान हुआ औऱ आचार संहिता की तलवार लटक गई, जिसके कारण चारों तरफ कई तरह की आशंका पैदा हो गई हैं।

उठे धरने औऱ प्रदर्शन

आचार संहिता की तलवार लटकते ही पंचकूला में चल रहे कई तरह के धरने प्रदर्शन खुद ही समाप्त हो गए। पुलिस प्रशासन को कुछ भी कहना व करना नहीं पड़ा, हालांकि एक तरह से पंचकूला को इन दिनों में जंतर मंतर बना दिया जाता है। उधर, सरकार के मुख्य सचिव ने आचार संहिता लग जाने का आधिकारिक ऐलान भी कर दिया। इसके लगते ही मुख्यमंत्री आवास से लेकर सीपीएस सीएम, मंत्रियों के आवास और आफिस सभी स्थानों जहां अक्सर भीड़ नजर आती थी, सभी गायब है। तबादले, पोस्टिंग और प्रमोशन अन्य कामों को लेकर चक्कर लगाने वालों की भीड़ भी अब राजधानी चंडीगढ़ से एकाएक गायब हो गई। सीएम हाउस की रौनक भी आचार संहिता की तलवार लटकते ही गायब हो चुकी है।

सियासी दलों के पास कम समय

आचार संहिता लग जाने के बाद सियासी दलों के पास 16 अगस्त के बाद से लगभग डेढ़ माह का वक्त है, जिसमें चुनावी प्रक्रिया नामांकन, फार्म वापसी, नामों की सूची, नामों का एलान और रैलियों के लिए भी वक्त निकालना होगा। पिछले चुनाव अर्थात 2019 की बात करें, तो यह सितंबर 21 को लगाई थी और 21 अक्टूबर को वोटिंग हुई थी। इस बार पहले  ही लागू हो गई है। कुल मिलाकर नई घोषणाओं, सौगातों पर विराम लग गया है। इतना ही नहीं, अब किसी भी तरह से कोई सत्र आदि होगा, इस पर भी विराम लगने जा रहा है। राज्य सरकार के मंत्रियों, अफसरों, घोषणाओं पर कई तरह की पाबंदियां लागू हो गई हैं, जिसके कारण अहम कार्यों, घोषणाओं, भर्तियों तमाम तरह के कामों  को चुनाव आयोग से परमिशन लेकर ही करना होगा, वो भी ज्यादा इमरजेंसी होगी तो ही परमिशन मिलेगी।

मुख्यमंत्री सैनी बोले-चुनाव आयोग स्वायत्त संस्था

हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संस्था है, उन्हें भी इतनी जल्दी आचार संहिता लग जाने का आभास नहीं था। हम सभी वर्गों को सौगात देने और प्रदेश के हर नागरिक  के कल्याण का संकल्प लेकर पहले ही दिन से काम कर रहे हैं। पूर्व सीएम मनोहरलाल ने भी गरीबों के कल्याण के लिए अंत्योदय की भावना से काम किया था। सैनी का कहना है कि तीसरी बार भी भाजपा सरकार बनेगी और आचार संहिता हटते ही इन सभी घोषणाओं को अमली जामा पहनाने का काम करेंगे।

जॉब सिक्योरिटी मामले में भी धर्मसंकट

जॉब की सुरक्षा को लेकर भले ही नायब सैनी सरकार ऑर्डिनेंस लेकर आई है, लेकिन बेहद देरी से यह फैसला हुआ, क्योंकि स्वतंत्रता दिवस से ठीक एक दिन पहले 14 अगस्त को ही राज्यपाल से इसे मंजूरी हुई है। दरअसल, सरकार की घोषणा के बाद भी इस प्रक्रिया में वक्त लगता है, साथ ही इस संबंध में मुख्य सचिव की ओर से दिशा निर्देश जारी होने थे। जॉब सिक्योरिटी संबंधी पत्र जारी करने के लिए अब सरकार को राज्य निर्वाचन और देश के चुनाव आयोग से इजाजत लेनी होगी। हालांकि आयोग इमरजेंसी मामलों में ही इजाजत देता है, क्योंकि उनका पूरा फोकस चुनाव कराने पर होता है। ऑर्डिनेंस मामले में फैसले में देरी से गाड़ी अटक गई है।

पहले से चल रही प्रक्रिया हो जाती सुस्त

आमतौर पर आचार संहिता लगते ही हर अधिकारी और एजेंसी किसी भी तरह का पंगा लेना और कानूनी पचड़ों से बचती है, क्योंकि विपक्षी पार्टियों, अन्य कई तरह की शिकायतों का डर बना रहता है। पूर्व की सरकारों द्वारा लिए गए फैसलों को लेकर भी पचड़े पड़ते रहे हैं। कर्मचारी भी फिलहाल असमंजस के हालात में हैं। हालांकि समान वेतन समान काम की मांग कर रहे कर्मियों को अब चुनावी मुहिम और आचार संहिता लग जाने के कारण एक डर बैठ गया है। उनको कम ही संभावनाएं लगती है कि इसका जरूरी फायदा मिल पाएगा।