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रवींद्र राठी, Bahadurgarh: एक तरफ जहां मौसम में गर्मी बढ़ रही है, वहीं सियासी पारा भी चढ़ने लगा है। लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने प्रदेश की सभी दस सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान कई दिन पहले ही कर दिया था। आम आदमी पार्टी भी जोर-शोर से कुरुक्षेत्र के रण में उतर चुकी है, इनेलो के अभय भी वहां डटे हुए हैं। कांग्रेस के सभी 9 प्रत्याशियों के नामों की घोषणा का इंतजार है। बेशक सभी प्रत्याशियों के नाम तय होने पर ही चुनावी गर्मी उफान पर होगी। लेकिन उससे पहले ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और पुरानी पेंशन स्कीम (ओपीएस) जैसे मुद्दे लोगों में चर्चा का केंद्र बन रहे हैं। विकास, रोजगार, महंगाई व सुरक्षा के साथ ही इन दोनों मुद्दों को लेकर बेरुखी सियासी दलों के लिए जोखिम का सबब बन सकती है।
एमएसपी को लेकर किसान जाहिर कर चुके आक्रोश
प्रदेश के ग्रामीण इलाके में किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को लेकर आक्रोश जाहिर कर रहे हैं। विदित है कि एमएसपी किसानों को दी जाने वाले एक गारंटी की तरह है। इसमें तय किया जाता है कि बाजार में किसानों की फसल किस दाम पर बिकेगी। पहली बार 1966-67 में एमएसपी दर लागू की गई थी। फसल की बुआई के दौरान ही सरकार द्वारा फसलों की कीमत तय कर दी जाती है और यह तय कीमत से कम में बाजारों में नहीं बिकती है। वर्तमान में देश के किसानों से खरीदी जाने वाली 23 फसलों पर एमएसपी लागू की गई है। किसान सी2 प्लस 50 प्रतिशत फार्मूले पर एमएसपी तय करने की मांग कर रहे हैं। इस बार फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी की मांग प्रमुख मुद्दा बनी हुई है।
ओपीएस की बहाली को लेकर लामबंद हैं कर्मचारी
लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद से ही पुरानी पेंशन बहाली को लेकर कर्मचारी संगठन सक्रिय हो गए हैं। कर्मचारी संगठनों का दावा है कि 85 लाख केंद्रीय एवं राज्य सरकारों के कर्मचारी एनपीएस को ओपीएस में बदलने की मांग कर रहे हैं। कर्मियों की मांगों में पीएफआरडीए एक्ट में संशोधन करना या उसे पूरी तरह खत्म करना भी शामिल है। हालांकि कांग्रेस के घोषणा पत्र में ओपीएस को जगह नहीं मिलने से कर्मचारी निराश हैं। एक जनवरी 2004 के बाद भर्ती हुए कर्मचारियों को न्यू पेंशन स्कीम (एनपीएस) के दायरे में रखा गया है। नई पेंशन योजना सरकारी के साथ गैर-सरकारी कर्मचारियों के लिए भी है। एनपीएस में हर महीने सैलरी से पैसे काटे जाते हैं।
