हरियाणा में IDFC बैंक घोटाले में अब केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की आधिकारिक एंट्री हो गई है। सीबीआई की आर्थिक अपराध शाखा ने नई दिल्ली में इस संबंध में पहली प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर ली है। जांच एजेंसी के सूत्रों के अनुसार दस्तावेजों के अध्ययन के बाद जल्द ही एक विशेष टीम चंडीगढ़ और पंचकूला का रुख करेगी। इस कार्रवाई के बाद भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) से केस की फाइलें ली जाएंगी, जिसके बाद प्रदेश के कई रसूखदार लोगों के ठिकानों पर छापेमारी की संभावना बढ़ गई है।
IAS अफसरों पर लटकी तलवार
अब तक इस पूरे मामले की कमान हरियाणा राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) के पास थी। एसीबी की जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि इस विशाल घोटाले को सरकारी अधिकारियों के संरक्षण में अंजाम दिया गया। इसी कड़ी में एजेंसी ने 5 आईएएस (IAS) अधिकारियों सहित कुल 6 वरिष्ठ अफसरों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के लिए धारा 17A के तहत सरकार से अनुमति मांगी थी। अब मामला सीबीआई के पास जाने से प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है, क्योंकि जांच का दायरा अब और अधिक व्यापक और निष्पक्ष होने की उम्मीद है।
फिक्स्ड डिपॉजिट के नाम पर हुआ था खेल
यह घोटाला उस समय शुरू हुआ जब हरियाणा सरकार के 18 अलग-अलग विभागों ने अपनी करीब 590 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि को सुरक्षित निवेश के तौर पर IDFC बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) करने का निर्णय लिया। अधिकारियों ने यह धनराशि बैंक को सौंपी, लेकिन इसे कभी भी सरकारी खातों में एफडी के रूप में दर्ज नहीं किया गया।
इस साजिश का पर्दाफाश तब हुआ जब एक विभाग ने फंड की जरूरत पड़ने पर अपना खाता बंद कर राशि को दूसरे बैंक में स्थानांतरित करने का आग्रह किया। बैंक स्टेटमेंट और विभाग के पास मौजूद आंकड़ों में जब करोड़ों का अंतर सामने आया, तो प्रशासन के होश उड़ गए। 18 फरवरी 2026 के बाद जब अन्य विभागों ने भी अपने खातों की जांच कराई, तो बैलेंस में भारी विसंगतियां पाई गईं।
मुख्यमंत्री की सख्ती और अब तक की गिरफ्तारियां
मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने तुरंत इसकी जांच एसीबी को सौंपी थी। एसीबी ने त्वरित कार्रवाई कर मुख्य आरोपी बैंक मैनेजर रिभव ऋषि को धर दबोचा। जांच में सामने आया कि आरोपी मैनेजर ने बैंक की नौकरी छोड़ने से पहले ही सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर इस रकम को निजी निवेश और प्रॉपर्टी मार्केट में डायवर्ट करने का जाल बुन लिया था।
एसीबी की टीम अब तक बैंक कर्मचारियों के अलावा, घोटाले के पैसे को खपाने वाले ज्वैलर्स और हरियाणा सरकार के दो वित्त अधिकारियों को भी सलाखों के पीछे भेज चुकी है। इसके अलावा, प्रवर्तन निदेशालय (ED) भी इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग के कोण से 19 ठिकानों पर छापेमारी कर चुकी है।
धोखाधड़ी को पेशेवर गिरोह की तरह अंजाम दिया गया
1. रिभव ऋषि (तत्कालीन बैंक मैनेजर): इस पूरे षड्यंत्र का मास्टरमाइंड, जिसने चंडीगढ़ सेक्टर-32 ब्रांच में रहते हुए इस फर्जीवाड़े की नींव रखी।
2. अभय (रिलेशनशिप मैनेजर): यह अधिकारियों से संपर्क साधकर उन्हें अपनी ब्रांच में एफडी खुलवाने के लिए प्रेरित करता था। इसने योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए अपनी पत्नी और साले को भी शामिल किया।
3. स्वाति सिंगला (फर्जी कंपनी की मालकिन): अभय की पत्नी स्वाति ने 'स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट' नाम से एक कंपनी बनाई। इसी कंपनी के खाते में सरकारी फंड ट्रांसफर किया गया, जिसे बाद में रियल एस्टेट और शेयर बाजार में निवेश कर दिया गया।
4. अभिषेक सिंगला (सह-साझेदार): स्वाति के भाई अभिषेक ने फंड को रीयल एस्टेट मार्केट में ठिकाने लगाने और वहां से नकदी निकालने का पूरा जिम्मा संभाला हुआ था।
पांच अधिकारियों की भूमिका पर रहेगी नजर
सीबीआई द्वारा दिल्ली में केस दर्ज किए जाने के बाद अब उन 5 आईएएस अधिकारियों की भूमिका पर सबसे ज्यादा नजर रहेगी, जिनका नाम एसीबी की रडार पर था। केंद्रीय जांच एजेंसी की यह सक्रियता संकेत दे रही है कि आने वाले दिनों में हरियाणा की ब्यूरोक्रेसी में बड़े स्तर पर धरपकड़ और पूछताछ का दौर शुरू होगा।