हरियाणा की नायब सैनी सरकार जिस औद्योगिक विकास का खाका खींच रही थी, उसे धरातल पर उतारना अब एक बड़ी चुनौती बन गया है। प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में प्रस्तावित 10 इंडस्ट्रियल मॉडल टाउनशिप (IMT) के निर्माण की राह में जमीन की कीमतें और कानूनी पेंच सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरे हैं। वर्तमान रिपोर्टों के अनुसार, केवल अंबाला जिले में ही किसानों के साथ बातचीत सफल होती दिख रही है, जबकि अन्य 9 स्थानों पर महंगी जमीन और मुआवजे की मांगों के कारण योजनाएं कागजों से बाहर नहीं निकल पा रही हैं।
अंबाला में सुलझता दिख रहा जमीन का मुद्दा
अंबाला कैंट और नारायणगढ़ के किसानों ने विकास की ओर कदम बढ़ाते हुए अपनी भूमि देने की इच्छा जताई है। यहां प्रशासन और किसानों के बीच जमीन की दरों को लेकर चल रहा विचार-विमर्श अब अंतिम पड़ाव पर है। ई-भूमि पोर्टल और स्थानीय स्तर पर आयोजित बैठकों से दोनों पक्षों के बीच एक व्यावहारिक कीमत पर सहमति बन गई है। उम्मीद है कि जल्द ही यहां रजिस्ट्री की प्रक्रिया आरंभ हो जाएगी, जिससे अंबाला में औद्योगिक निवेश का नया मार्ग प्रशस्त होगा।
महंगे मुआवजे की मांग ने रोकी अन्य जिलों की रफ्तार
यमुनानगर, रेवाड़ी, फरीदाबाद, पलवल, जींद और हिसार जैसे औद्योगिक रूप से महत्वपूर्ण जिलों में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। यहां किसान अपनी जमीन के बदले कलेक्टर रेट से 6 से 8 गुना अधिक राशि की मांग कर रहे हैं। सरकार ने अपना रुख स्पष्ट किया है कि वह जबरन भूमि अधिग्रहण नहीं करेगी और केवल आपसी सहमति व बाजार आधारित मॉडल पर ही जमीन खरीदेगी। इसी गतिरोध के कारण इन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रस्तावित टाउनशिप का काम ठप पड़ा है।
नीतियों में बड़े बदलाव की तैयारी
FAR और भूमि सीमा पर फैसला जमीन की कमी और ऊंचे दामों को देखते हुए उद्योग विभाग अपनी शर्तों में ढील देने पर विचार कर रहा है। विभाग का मानना है कि 1500 एकड़ की न्यूनतम भूमि सीमा कई जिलों में बाधा बन रही है, जिसे अब घटाकर 1200 एकड़ करने की प्रक्रिया जारी है। साथ ही, फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) के नियमों को लचीला बनाया जा रहा है ताकि कम जमीन पर ऊंची औद्योगिक इमारतें और क्लस्टर विकसित किए जा सकें। यह बदलाव मानेसर और खरखौदा जैसे सफल मॉडलों की तर्ज पर किया जा रहा है।
हाईकोर्ट पहुंचा विवाद
सरकार की मुश्किलों में उस वक्त इजाफा हो गया जब पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में राज्य की नई भूमि नीति को चुनौती दे दी गई। जींद के एक किसान ने इस नीति को 'भूमि अधिग्रहण कानून 2013' के खिलाफ बताते हुए रद्द करने की मांग की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सरकार द्वारा तय मुआवजा कलेक्टर रेट का अधिकतम 3 गुना है, जो केंद्रीय नियमों के मुकाबले काफी कम है। साथ ही, नीति में बिचौलियों को 1 प्रतिशत कमीशन देने के प्रावधान पर भी भ्रष्टाचार की आशंका जताई गई है।
प्रस्तावित परियोजनाओं का बड़ा दायरा
सरकार की योजना के तहत जींद में दिल्ली-कटरा एक्सप्रेस-वे के पास 12 हजार एकड़ में सबसे बड़ी टाउनशिप बनाने का लक्ष्य है। वहीं, फरीदाबाद और पलवल में भी करीब 13 हजार एकड़ जमीन की आवश्यकता है, जिसे जेवर एयरपोर्ट से जोड़ने वाले नेशनल हाईवे के किनारे विकसित किया जाना है। रेवाड़ी में 5 हजार एकड़ में कोसली और आसपास के गांवों को मिलाकर नया औद्योगिक जोन तैयार करने की मंशा है। लेकिन इन सभी बड़े लक्ष्यों के सामने जमीन की उपलब्धता अब एक यक्ष प्रश्न बनकर खड़ी हो गई है।
अगर आपको यह खबर उपयोगी लगी हो, तो इसे सोशल मीडिया पर शेयर करना न भूलें और हर अपडेट के लिए जुड़े रहिए haribhoomi.com के साथ।
