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Haryana: आखिरकार हरियाणा के ट्रेजडी किंग कहे जाने वाले बीरेंद्र सिंह के साथ एक बार फिर खेला हो गया। भाजपा छोड़कर कांग्रेस में गए बीरेंद्र सिंह को कांग्रेस की ओर से भी ठेंगा दिखा दिया गया। हरियाणा में कांग्रेस द्वारा टिकटों का ऐलान किए जाने के बाद चौधरी बीरेंद्र सिंह फिर से राजनीति के ट्रेजडी किंग साबित हो गए। सांसद बेटे बृजेन्द्र सिंह की हिसार से टिकट कटने के चक्कर में पूरे परिवार ने भाजपा छोड़ी ओर कांग्रेस का दामन थाम लिया, लेकिन कांग्रेस ने भी बीरेंद्र सिंह व उनके बेटे बृजेन्द्र सिंह पर भरोसा नहीं किया।

हिसार से बृजेंद्र सिंह को मैदान में उतारने की थी अटकलें

अटकलें लगाई जा रही थी कि कांग्रेस बृजेन्द्र सिंह को उनके पुराने लोकसभा क्षेत्र हिसार से चुनाव मैदान में उतार सकती है। आपात स्थिति में सोनीपत से भी बृजेन्द्र सिंह को उतारने की बात चल रही थी। पिछले कुछ दिनों से बीरेंद्र सिंह व उनके सांसद बेटे बृजेन्द्र सिंह ने चुनाव की तैयारी शुरू कर दी थी। बीती रात जारी हुई सूची के बाद चौधरी पिता-पुत्र को फिर से मायूसी हाथ लगी। चौधरी बीरेंद्र सिंह प्रदेश के उन नेताओं में से हैं जिनका मुख्यमंत्री बनने का सपना आज तक अधूरा है। हरियाणा की राजनीतिक के ट्रेजडी किंग की किस्मत ने कभी साथ नहीं दिया। बीरेंद्र सिंह ने अपना पहला चुनाव उचाना से 1977 में लड़ा और वह जीत हासिल करते हुए विधायक बने।

सीएम न बनने की टीस बीरेंद्र सिंह को हमेशा रही

बीरेंद्र सिंह को कभी सीएम नहीं बन पाने की टीस हमेशा से रही। वह खुद अनेक बार अलग-अलग मंचों से इसका जिक्र भी करते रहे। 2009 में पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा से मतभेद के चलते वे केंद्र की राजनीति में चले गए। 2010 में कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा का सांसद बनाया, लेकिन केंद्र में मंत्री बनते-बनते रह गए। हालांकि कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा सांसद बनाने के बाद कई अहम राज्यों का प्रभारी जरूर बनाया। 2014 में भारतीय जनता पार्टी की लहर के चलते बीरेंद्र सिंह ने कांग्रेस से अपना 43 साल पुराना नाता तोड़ लिया। बीरेंद्र सिंह ने हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले 16 अगस्त 2014 को बीजेपी का दामन थाम लिया। इसके बाद बचे हुए 2 साल के कार्यकाल में वे बीजेपी की तरफ से फिर से राज्यसभा सांसद बने।

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में बने केंद्र में मंत्री

2014 में पहली बार बीरेंद्र सिंह को मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में केंद्र में मंत्री बनाया गया। उन्हें काफी हेवीवेट ग्रामीण विकास मंत्रालय, पंचायती राज मंत्रालय और पेयजल व स्वच्छता मंत्रालय का प्रभार दिया गया। उनकी पत्नी प्रेमलत्ता ने उचाना सीट से बीजेपी टिकट पर चुनाव लड़ते हुए दुष्यंत चौटाला को हराया। वर्ष 1991 में बीरेंद्र सिंह का सीएम बनना तय था, लेकिन राजीव गांधी की हत्या हो गई। इसके साथ ही बीरेंद्र सिंह के सितारे गर्दिश में चले गए और कांग्रेस हाईकमान ने 23 जुलाई 1991 को उनकी जगह भजनलाल को सीएम बना दिया।

कई बार इंटरव्यू में बयां कर चुके दर्द

बीरेंद्र सिंह खुद अपने इंटरव्यू में कई बार कह चुके हैं कि उनका 2009 में मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए-2 सरकार में मंत्री बनना तय हो चुका था। उन्हें पार्टी का ऑफिशियली इन्विटेशन भी मिल गया कि कल सुबह मंत्रीपद की शपथ लेनी है। उन्होंने नया सूट सिलवा लिया, लेकिन सुबह पता चला कि केंद्रीय मंत्रियों वाली लिस्ट से उनका नाम कट चुका है। अब उचाना सीट को लेकर बीरेंद्र सिंह ने जजपा और भाजपा गठबंधन तुड़वाने को लेकर कई महीने तक दबाव बनाया। भाजपा ने जजपा के साथ जब तक गठबंधन तोड़ा, तब तक बीरेंद्र सिंह का सांसद बेटा भाजपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हो चुका था और बीरेंद्र सिंह भाजपा छोड़ने का ऐलान कर चुके थे।