Aravalli Hills: वन विभाग की तरफ से अरावली की पहाड़ियों में बनें धार्मिक स्थलों को नोटिस जारी किया गया है। नोटिस में विभाग ने अवैध निर्माण को 15 दिन हटाने का आदेश दिया है। अगर नोटिस जारी होने के बावजूद भी अवैध निर्माण को हटाया नहीं गया तो, विभाग द्वारा कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
विभाग ने मंदिर परिसर में 2 नोटिस भी चिपकाए हैं। वन विभाग ने पिछले साल जून और जुलाई में सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर अरावली वन एरिया में स्थित अवैध निर्माण के खिलाफ बुलडोजर अभियान भी चलाया गया गया था। करीब डेढ़ महीने की इस कार्रवाई में लक्कड़पुर, अनंगपुर, अनखीर और मेवला महाराजपुर क्षेत्र में अवैध निर्माणों को हटाया था।
241 अवैध निर्माण को तोड़ा
वन विभाग की टीम ने 88 जगहों पर 261.06 एकड़ एरिया में फैले 241 अवैध निर्माण को तोड़ा गया था। वन विभाग को अनंगपुर गांव में तोड़फोड़ के दौरान परेशानियों का सामना करना पड़ा था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर CEC टीम बनाई थी, वहीं सीईसी ने मौके का निरीक्षण करके रिपोर्ट कोर्ट में भी पेश की थी। अरावली में 780.26 एकड़ जमीन पर अवैध निर्माण है। इसमें अनंगपुर में 286 एकड़ जमीन पर 5948 निर्माण, अनखीर में 250 एकड़ जमीन में 339, लक्कड़पुर में 197 एकड़ जमीन पर 313 और मेवला महाराजपुर में 46 एकड़ जमीन पर 193 अवैध निर्माण बने हुए हैं।
अवैध निर्माण में मैरिज हॉल, बैंक्वेट हॉल, औद्योगिक इकाइयां और आवासीय भवन भी शामिल हैं। विभाग ने नोटिस जारी करके 15 दिन का समय दिया है। नोटिस में लिखा है कि धार्मिक जगहों पर अवैध संरचना को बनाया गया है। जो अरावली में PLPA एक्ट का उल्लंघन करती है। अरावली केवल पौधे लगाने के लिए है, इसमें किसी तरह का निर्माण गैर-कानूनी है। ऐसे में परिसर में बनाई गई संरचना को हटाने के लिए 15 दिन का वक्त दिया जाता है।
पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने रिपोर्ट पेश की
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने जनवरी में रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 'अरावली पर्वतमाला में अतिक्रमण, वनों की कटाई, अवैध खनन और शहरी बुनियादी ढांचे के विस्तार ने भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता, वायु गुणवत्ता और जलवायु संतुलन पर गंभीर असर डाला है।'
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 1980 के दशक से पहले खासतौर से सरिस्का और बरदोद वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास बड़े पैमाने पर वन भूमि में बदलाव की वजह से प्राकृतिक वन आवरण में भारी गिरावट देखने को मिली है। जिसकी वजह से वन्यजीव के घरों और जलग्रहण क्षेत्रों का विखंडन हुआ। अरावली परिदृश्य के पारिस्थितिक पुनर्स्थापन पर यह शोध सांकला फाउंडेशन द्वारा भारत में डेनमार्क दूतावास और हरियाणा राज्य वन विभाग के सहयोग से किया गया था।
अरावली क्षेत्र में पारिस्थितिक गिरावट से छुटकारा पाने के लिए पर्यावरणीय स्थिरता को जैव विविधता संरक्षण, जलवायु लचीलापन, आजीविका सुरक्षा और मानवाधिकारों से कनेक्ट किया गया है। अरावली पर्वतमाला भारत के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) और सिंधु-गंगा के मैदानों के लिए जरूरी प्राकृतिक अवरोध और जीवन-निर्वाह में मदद करने वाला पारिस्थितिकी तंत्र है।
रिपोर्ट में इन पर जताई चिंता
रिपोर्ट में कहा गया है, 'हालांकि, चार राज्यों और 29 जिलों में फैला यह नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र, जो 5 करोड़ से अधिक लोगों का घर है, वनों की कटाई, तेजी से शहरीकरण सहित अस्थिर भूमि उपयोग और व्यापक भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण के कारण गंभीर खतरे में है।'
अध्ययन में कहा गया है, "अतिक्रमण, वनों की कटाई, अवैध खनन और शहरी अवसंरचना के विस्तार ने इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र में भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता, वायु गुणवत्ता और जलवायु विनियमन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, और अरावली की हरित अवरोध के रूप में काम करने की क्षमता को कमजोर कर दिया है, जिससे मरुस्थलीकरण में तेजी आई है और उत्तरी मैदानों की पारिस्थितिकी स्थिरता को खतरा पैदा हो गया है।'
संकला फाउंडेशन ने गुरुग्राम के अरावली क्षेत्र में 4 गांवों को चुनकर स्थल-विशिष्ट, साक्ष्य-आधारित और समुदाय-समावेशी पारिस्थितिकी बहाली मॉडल लागू किया है। यह मॉडल जिले के दक्षिणी भाग पर केंद्रित है, और इन पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान करने के लिए एक व्यवहारिक दृष्टिकोण प्रदान करता है।










