अम्बिकापुर। सरगुजा में एक ऐसा प्राचीन देवी मंदिर है जहां देवी की प्रतिमा स्थापित नहीं की गई है। मंदिर में खड्ग एवं नगाड़ा की स्थापना की गई है। मंदिर में स्थापित नगाड़ा को ही देवी का स्वरूप मानकर नवरात्रि में विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। सरगुजा प्राचीन दण्डकारण्य के बीहड़ वन का प्रमुख हिस्सा रहा है। नवरात्रि मान्यता है कि अपने वनवास काल में भगवान राम ने रामगढ़ की कंदराओं में लम्बे समय तक निवास किया था। सरगुजा के विभिन्न अंचलों में मिले प्राचीन मंदिरों के अवशेष इसके आध्यात्मिक महत्व को प्रतिपादित करते हैं। इसे सरगुजा के ऋषि मुनियों की तपस्थली भी माना जाता है। यहां शैव एवं शाक्त परम्परा के कई प्राचीन मंदिर है जो प्राचीन काल में सरगुजा की आध्यात्मिक सिद्धियों को साबित करने के लिए पर्याप्त माना जाता है।
पंचमी को बदलता है कलेवर
परम्परानुसार शारदीय नवरात्र के दौरान पंचमी तिथि को नगाड़ा का कलेवर बदला जाता है। घसिया समाज का एक मात्र परिवार नगाड़ा का कलेवर बदलता है तथा पंचमी तिथि को देवी स्वरूप में नए कलेवर में नगाड़ा की स्थापना की जाती है। मंदिर में नगाड़ा के स्थापना की विधि भी अनूठी है। जमींदार परिवार के वरिष्ठ सदस्य, जनजातीय समाज का बैगा एवं नीवन स्वरूप प्रदान करने वाला घसिया परिवार का नगादची सदस्य एक साथ पूजा-अर्चना कर देवी स्वरूप में नगाड़ा की स्थापना करते हैं। अन्य देवी मंदिरों में सप्तमी तिथि से देवी की विशेष आराधना होती है।
बेसरापाट में भी होती है देवी की पूजा
बेसरापाट पहाड़ी के पास भी मंदिर का निर्माण किया गया है। अजय चतुर्वेदी के अनुसार बड़की माई मंदिर में स्थापित नगाड़ा को ही देवी का स्वरूप माना जाता है तथा पंचमी को नगाड़ा का कलेवर बदला जाता है। सरगुजा के इतिहासकार गोविंद शर्मा ने बताया सरगुजा प्रारंभ से ही शक्ति की उपासना का प्रमुख केंद्र रहा है तथा यहां विभिन्न स्वरूपों में देवी महामाया की पूजा-अर्चना की परंपरा है।
नगाड़ा में है देवी का पिण्ड
पंचमी तिथि को ही पूजा के दौरान साल में एक बार नगाड़ा को बजाया जाता है। शंकरगढ़ जमींदार परिवार के वरिष्ठ सदस्य एवं गृहनिर्माण मंडल के अध्यक्ष अनुराग सिंहदेव बताते हैं कि क्षेत्रवासी नगाड़े को ही देवी का पिंड मानते हैं तथा श्रद्धापूर्वक सालभर पूजा-अर्चना करते हैं। बड़की माई सभी वर्ग-समुदाय के लोगों की अराध्य देवी हैं।