रायपुर। छत्तीसगढ़ में दुर्ग जिले के बाद अब बलरामपुर जिले में अफीम की खेती का खुलासा हो गया है, लेकिन इससे पहले गृह विभाग की एक रिपोर्ट में सरकार को बताया गया था कि छत्तीसगढ़ में गांजे-अफीम की खेती नहीं होती। खास बात ये है कि राज्य में पहले भी गांजे की फसल उगाने के भी गांजे की फसल उगाने के मामले सामने आए हैं, अब अफीम की लहलहाती फसल बता रही है कि कम से इस मामले में नारकोटिक्स सेल फेल हो गई है।
राज्य सरकार के गृह विभाग की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 में नारकोटिक्स सेल के कामकाज का ब्योरा देते हुए कहा गया है- छत्तीसगढ़ राज्य की सीमा ओड़िशा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, उत्तरप्रदेश, झारखण्ड, तेलंगाना एवं मध्यप्रदेश से जुड़ी हुई है। राज्य में गांजे व अफीम की खेती परिलक्षित नहीं है, किंतु छत्तीसगढ़ राज्य के रास्ते अन्य राज्यों में गांजा अफीम की तस्करी की जा रही है।
दुर्ग के बाद बलरामपुर में अफीम की खेती
गृह विभाग की रिपोर्ट में बताए गए तथ्यों के उलट हाल ही में दुर्ग जिले में अफीम की खेती करने का मामला खुलने के बाद अब बलरामपुर जिले में यह खेती पकड़ में आई है। इन दोनों मामलों से साफ हुआ है कि छत्तीसगढ़ में अफीम की खेती हो रही है। हालांकि दुर्ग का मामला सामने आने पर सरकारी सूत्रों ने कहा था कि पुलिस, आबकारी विभाग, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी तथा राजस्व विभाग की संयुक्त टीम द्वारा की गई कार्रवाई में लगभग 5 एकड़ 62 डिसमिल क्षेत्र में लगे अफीम के पौधों को जब्त किया गया है, जिनकी अनुमानित कीमत लगभग 8 करोड़ रुपए आंकी गई है।
इसे क्यों उगाते हैं
इस अवैध फसल को उगाने के पीछे कारण आमतौर पर ये होते हैं, छोटी जमीन में बहुत ज्यादा कमाई, नकद भुगतान, दूरदराज इलाकों में कम पुलिस निगरानी, एजेंट खुद बीज और सुरक्षा देते हैं, यह सब कुछ छत्तीसगढ़ के दुर्ग और बलरामपुर में भी हो रहा था। संभव है कि राज्य के अन्य कुछ जिलों में भी यही गोरखधंधा चल रहा हो, लेकिन वह फिलहाल पकड़ में नहीं आया है।
लाइसेंस लेकर भी होती है वैध खेती
भारत में अफीम की खेती पूरी तरह अवैध नहीं है। लेकिन केवल लाइसेंस लेकर और सरकार को बेचने की शर्त पर ही इसकी खेती मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में होती है। अफीम की खेती की शुरुआत बीजों से की जाती है। इसके लिए सीधे खेत में बीज बोए जाते हैं, अफीम के बीजों को ही हम 'खसखस कहते है, जिनका उपयोग रसोई में मसालों के रूप में भी होता है। बुवाई के लिए बहुत ही बारीक और उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन किया जाता है। बीजों को सीधे तैयार किए गए समतल खेत में छिड़क कर या कतारों में बोया जाता है। पौधा करीब 3 से 4 फीट तक ऊंचा होता है और उसके बाद ही इसमें वह मुख्य फल (डोडा) लगता है जिससे अफीम निकाली जाती है।