लवकुश शुक्ला- रायपुर। भगवान शिव की आस्था से जुड़े रायपुर से 35 से 40 किलोमीटर की दूरी पर दो ऐसे शिवधाम हैं, जिनके उद्भव से जुड़ी कई मान्यताएं उन्हें दूसरे शिवालयों से अलग पहचान है। दिलाती खास बात यह है कि शिवलिंग का कट लगातार बढ़ भी रहा है। इनमें एक धमधा-दुर्ग मार्ग पर स्थित कोड़िया गांव है। यहां 300 साल पहले मालगुजारी के दौर में जिस स्थान पर घुरवा हुआ करता था, वहीं से भू-फोड़ शिवलिंग का उद्भव हुआ। उस स्थान पर बनवाया गया छोटा मंदिर अब भव्य स्वरूप ले चुका है। इसी तरह तरपोंगी के पास स्थित मोहदा गांव में 204 साल पहले तालाब के किनारे भू-फोड़ शिवलिंग का दर्शन लोगों ने किया। यहां शिवरात्रि पर ही नहीं बल्कि होली के दिन भी आस्था का सैलाब उमड़ता है।
राजधानी, करीब 40 किलोमीटर दूर धमधा-दुर्ग पर स्थित कोड़िया गांव में इन दिनों भू-फोड़ शिवधाम में आस्था का सैलाब हर सावन और महाशिवरात्रि के अवसर पर उमड़ता है। यहां के पुजारी पंडित रमेश गोस्वामी ने बताया कि मेरे परिवार से चौथी पीढ़ी भुईंया फोड़ शिवधाम की सेवा में लगी है। यहां महाशिवरात्रि से पहले की रात एक बजे से भक्तों के लिए शिवधाम का पट खोला जाता है। यहां की मान्यता है कि महादेव भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं। लोग संतान प्राप्ति के लिए मनौती लेकर शिवधाम में आते हैं। गांव के निवासी 75 वर्षिय फूलचंद धीवर ने बताया कि हमारे दादा-परदादा बताते थे, कि जिस जगह पर अभी भगवान का शिवधाम है, वहां पर मालगुजारी के दौर में घुरवा हुआ करता था। इसके पास ही खुला कुंआ था, जिसमें लोग ही नहीं जानवर भी गिरते थे तो उनको किसी प्रकार की हानि नहीं होती थी। जब घुरवा की सफाई करवाई गई, तो वहां भू-फोड़ शिवलिंग दिखाई दिया।
कोड़िया गांव को शिवधाम पूर्ण होते हैं मनोरथ
श्री धीवर ने बताया कि तब मालगुजार ने छोटे से मंदिर का निर्माण करवाया। उस समय शिवलिंग की आकृति छोटे स्वरूप में थी। धीरे-धीरे अब शिवलिंग करीब तीन फीट ऊंचा हो गया है। मंदिर में शिवलिंग के सामने ध्यान करने से शिवलिंग कपूर की तरह सफेद और चमकदार दिखाई देता है। आंख खोलने पर लोग सामान्य स्वरूप में ही देर्शन प्राप्त करते हैं। घुरवा के पास अब मंदिर और उसके पास स्थित कुंआ अब भी यथावत है।
मोहदेश्वर महादेव में आस्था का मेला
रायपुर जिले के मोहदा गांव में स्थित मोहदेश्वर धाम अनूठा शिवालय है, यहां के भू-फोड़ शिवलिंग से जुड़ी 204 साल पुरानी कई रोचक मान्यताएं हैं। यह जिले का इकलौता गांव है, जहां शिवलिंग का दर्शन करने के लिए 64 साल से लोग होलिका दहन की रात में ही गांव की सरहद में पहुंचते हैं। लोगों की भीड़ हर साल बढ़ने से मेला भी लगने लगा है। इसे देखते हुए गांव के लोग होली दोपहर 12 बजे के बाद ही मनाते हैं। इतना ही नहीं महाशिवरात्रि पर आस्था का सैलाब उमड़ता है। रायपुर से बिलासपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर 33 किलोमीटर चलने के बाद भक्त तरपोंगी पहुंचते हैं। यहां से 2 किलोमीटर की दूरी पर मोहदा गांव है। यहां की तपोभूमि को मोहदेश्वर धाम के नाम से जाना जाता है। यहां शिवलिंग का कद बढ़कर ढाई फीट हो गया है।
सावन में मनौती, होली की रात जलाभिषेक
86 वर्षीय माखन लाल वर्मा ने बत्ताया कि गांव के बाहर रानी सागर तालाब के किनारे 204 साल पहले लोगों ने भू-फोड़ शिवलिंग का स्वरूप देखा था जो स्वतः ही जमीन से बाहर आने से आस्था का केंद्र बन गया। सावन के महीने में लोग शिवलिंग का दर्शन करने और मनौती के लिए पहुंचते हैं। जिन लोगों की मन्नत पूरी होती है, वे हर साल होलिका दहन की रात महादेव को जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। इसके चलते 64 साल से गांव के लोग होली का पर्व दोपहर के बाद मनाते हैं। सरपंच भरत रात्रे और हिमांशु ने बताया, होली से पहले मंदिर का रंग-रोगन किया जाता है। साथ ही मेला स्थल की सफाई के बाद तीन दिन पहले ही रोशनी के लिए लाइट लगाई जाती है।
गांव के किसी भी घर में नहीं लगाते हैं ताला
86 वर्षीय माखन लाल वर्मा बताते हैं कि भू-फोड़ शिवलिंग कब निकला, इसे बता पाना मुश्किल है। संतोष बिजौरा ने बताया कि होलिका दहन की रात गांव में किसी भी घर में ताला नहीं लगाया जाता है।
