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फ़िरोज़ खान- कांकेर। छत्तीसगढ़ के कांकेर  जिले के अंतागढ़ ब्लॉक की आमाबेड़ा तहसील जो कभी नक्सल प्रभावित मानी जाती थी। अब उसकी तस्वीर बदल रही है। कभी नक्सल का दंश झेल रहा यह इलाका आज जागरूकता का परिचय शिक्षा के माध्यम से दे रहा है। वहीं संचालित स्कूल में विभिन्न जगहों से आकर छात्र छात्रा पढ़ाई करते है और पढ़ाई के साथ- साथ उन्हें आदिवासी संस्कृति के प्रति भी बताया जाता है। जो कि, काफी सराहनीय है। 

आपको बता दें कि, यह आश्रम के रूप में संचालित है। जो कि, गोंडवाना गोंड महासभा के सहयोग से स्थानीय सेवा मुरी नाम के युवा प्रभाग के द्वारा संचालित है। इस विद्यालय का नाम कोयामुरी बुम होरकुल बिदिया केतुल है। जिसका अर्थ स्वच्छ निर्मल विचारधाराओं से अपनी परंपरा संस्कृति को सहेजते हुए मातृ भाषा, राष्ट्रीय भाषा, अंतरराष्ट्रीय भाषाओं का विद्यालय। 

हिंदी, अंग्रेजी के अलावा गोंडी में दी जाती है शिक्षा 

अंतागढ़ से महज 40 किलोमीटर की दूरी में स्थित यह गांव जो चर्रेमर्रे की सुंदर घाटी के ऊपर बसा है। यह शिक्षा के साथ- साथ संस्कृति को लेकर एक नई अलख जगा रहा है. जी हां... हम बात कर रहे हैं, आमाबेड़ा तहसील अंतर्गत वेलेकनार गांव आता है। जहां यह गोंडी स्कूल संचालित है। वेलेकनार का हिंदी अनुवाद होता है, सेमरगांव। यहां स्कूल में हिंदी, अंग्रेजी के अलावा गोंडी भाषा का भी अध्ययन कराया जाता है। आधुनिकता की दौड़ और शहरी पाश्चात्य नीतियों को अपना कर कई भाषाओं और बोलियों, संस्कृतियों को आज भुला दिया गया है। आदिवासी समाज के इस पहल की चर्चा जोरो पर है और बच्चों को गोंडी भाषा के साथ सामाजिक रीतिनीतियों को भी इस जगह पर सिखाया जाता है। 

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बच्चे भी पढ़ाई के प्रति उत्सुक 

बच्चों से बातचीत की गई तो अचंभा हुआ यह देख कर कि अंदरूनी क्षेत्र के बच्चों में इतनी चंचलता और पढ़ाई के प्रति लगन को देख पाठन का करा रहे शिक्षक और पालकों में भी इस बात की सीधी संतुष्टि देखी जा सकती है। जिससे कहा जा सकता है कि, क्षेत्र की तस्वीर अब बदल रही है। वहीं ग्रामीणों ने यह भी जानकारी दी कि, एक दशक पहले माओवादियों के तोड़फोड़ के कारण स्कूल को बंद करना पड़ा था। उसे फिर से 2022 से यह स्कूल फिर से खोला गया है।