पंकज गुप्ते-बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामले में एक अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि, साझेदारी फर्म को आरोपी बनाए बिना भी उसके पार्टनर के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को बहाल करते हुए आरोपी को 30 लाख रुपए की राशि के साथ 10 प्रतिशत अतिरिक्त मुआवजा चुकाने का आदेश दिया है।
दरअसल दुर्ग निवासी महिला ने परिचित व्यक्ति को वर्ष 2014 में 30 लाख रुपए उधार दिए थे। तय समय पर राशि वापस नहीं मिलने पर आरोपी ने 19 जुलाई 2016 को 30 लाख रुपए का चेक दिया, जो बैंक में प्रस्तुत करने पर अपर्याप्त राशि के कारण बाउंस हो गया। इसके बाद नोटिस देने के बावजूद भुगतान नहीं किया गया, जिस पर परिवाद दायर किया गया। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, दुर्ग ने मामले में सुनवाई के बाद आरोपी को दोषी मानते हुए 6 माह के साधारण कारावास और 30 लाख रुपए क्षतिपूर्ति की सजा सुनाई थी।
साझेदारी फर्म अलग कानूनी इकाई नहीं होती
हालांकि अपीलीय अदालत ने यह कहते हुए आरोपी को बरी कर दिया था कि, फर्म को पक्षकार नहीं बनाया गया। हाईकोर्ट ने अपीलीय अदालत के इस फैसले को गलत ठहराते हुए कहा कि साझेदारी फर्म अलग कानूनी इकाई नहीं होती, बल्कि उसके पार्टनर ही उसकी पहचान होते हैं। ऐसे में फर्म को आरोपी न बनाए जाने या नोटिस न देने के आधार पर शिकायत खारिज नहीं की जा सकती।
पार्टनर की जिम्मेदारी संयुक्त और व्यक्तिगत दोनों
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि, पार्टनर की जिम्मेदारी संयुक्त और व्यक्तिगत दोनों होती है, इसलिए उसके खिलाफ सीधे कार्रवाई संभव है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दोष सिद्ध करने के निष्कर्ष सही थे, जिन्हें अपीलीय अदालत ने बिना उचित आधार के पलट दिया।
चार माह के भीतर पैसे और 10 प्रतिशत मुआवजा देने के निर्देश
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अपीलीय अदालत का आदेश निरस्त कर दिया और ट्रायल कोर्ट का फैसला बहाल करते हुए आरोपी को चार माह के भीतर पूरी राशि व 10 प्रतिशत अतिरिक्त मुआवजा जमा करने के निर्देश दिए। भुगतान न करने की स्थिति में छह माह के कठोर कारावास का प्रावधान भी रखा गया है।








