Holika Dahan 2026: हिंदू पंचांग के अनुसार होलिका दहन का पर्व फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या को मनाया जाता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है और भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति की याद दिलाता है। होलिका दहन को छोटी होली भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन प्रज्वलित की जाने वाली अग्नि नकारात्मकता, भय और अशुभ प्रभावों को दूर करती है। इसलिए इस रात का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व विशेष रूप से माना गया है। यहां जानें इस दौरान क्या करें और किन चीजों से बचें।
होलिका दहन सही तिथि और मुहूर्त
- पूर्णिमा तिथि प्रारंभ – 02 मार्च 2026, शाम 05:55 बजे
- पूर्णिमा तिथि समाप्त – 03 मार्च 2026, शाम 05:07 बजे
- होलिका दहन का शुभ मुहूर्त – शाम 06:44 बजे से रात 09:11 बजे तक
भद्रा काल
- भद्रा पूंछ – 03 मार्च को प्रातः 01:25 से 02:35 बजे तक
- भद्रा मुख – 03 मार्च को प्रातः 02:35 से 04:30 बजे तक
होलिका दहन के दिन किन बातों से बचें?
- तामसिक भोजन जैसे मांस और मदिरा का सेवन न करें।
- किसी को धन उधार देने से बचें।
- सास और बहू को एक साथ होलिका दहन न देखने की सलाह दी जाती है, मान्यता है कि इससे पारिवारिक तनाव बढ़ सकता है।
- पति-पत्नी के बीच वाद-विवाद से बचें।
- होलिका की अग्नि में कूड़ा, चमड़ा या फटे-पुराने कपड़े न डालें।
- गर्भवती महिलाओं को अग्नि के अत्यधिक समीप जाने या सीधे देखने से बचने की सलाह दी जाती है।
- इस दिन नाखून काटना शुभ नहीं माना जाता।
- ये सभी बातें पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिनका उद्देश्य घर-परिवार में शांति और सकारात्मकता बनाए रखना है।
होलिका दहन के दिन क्या करें?
- विधि-विधान से पूजा करने के बाद होलिका की परिक्रमा करें।
- अग्नि में जौ या गेहूं की बालियां, चना, मूंग, चावल, नारियल, गन्ना और बताशे अर्पित करें।
- जौ की बालियों को भूनकर प्रसाद स्वरूप ग्रहण करें और अन्य लोगों में बांटें।
- होलिका दहन के बाद परिजनों और मित्रों को रंग का टीका लगाएं।
- दिनभर सात्विक भोजन का सेवन करें और मन में सकारात्मक भाव रखें।
धार्मिक महत्व
होलिका दहन का संबंध भक्त प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप की कथा से जुड़ा है। यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति, सत्य और धर्म की राह पर चलने वालों की हमेशा विजय होती है। अग्नि में आहुति देना प्रतीकात्मक रूप से नकारात्मक विचारों और बुरी आदतों को त्यागने का संकेत है।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। हरिभूमि.कॉम इसकी पुष्टि नहीं करता है।








