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आरटीआई लागू होने के 13 साल बाद भी क्यों यह कानून हो रहा कमजोर?

आरटीआई का कानून भले ही 2005 में पारित कर दिया गया हो लेकिन तब से लेकर आज तक की उसकी यात्रा आसान नहीं रही है। समय-समय पर विधायिकाओं और कार्यकारी ने ही आरटीआई की शक्तियों को कई संशोधनों की सहायता से सीमित करने का प्रयास किया। पढ़िए आरटीआई दिवस पर क्या कहते हैं आशुतोष मिश्रा।

आरटीआई लागू होने के 13 साल बाद भी क्यों यह कानून हो रहा कमजोर?
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भारत में RTI कानून लागू होने के बाद क्या है आज की स्थिति, कैसे बढ़ेगा देश आगे इस पर अपनी राय दे रहे हैं आशुतोष मिश्रा...
आज सूचना का अधिकार (RTI) दिवस है। 12 अक्टूबर 2005 का ही दिन था जब सूचना का अधिकार कानून लागू हुआ था। इस कानून ने देश के सामान्य नागरिक के हाथों में एक अलग ही ताकत दे दी।
अगर हम यह कहें कि आजादी के बाद यह पहला कानून है जिसने आम नागरिक को यह अधिकार दिया कि वह कार्यकारी से सवाल पूछ सके तो यह राजनैतिक अतिश्योक्ति नहीं होगी। आरटीआई की जड़ें संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के तहत "स्वतंत्रता का अधिकार" के मौलिक अधिकारों में खोजी जा सकती हैं। जो हमें जानने का अधिकार भी देती हैं।
आरटीआई का कानून भले ही 2005 में पारित कर दिया गया हो लेकिन तब से लेकर आज तक की उसकी यात्रा आसान नहीं रही है। समय-समय पर विधायिकाओं और कार्यकारी ने ही आरटीआई की शक्तियों को कई संशोधनों की सहायता से सीमित करने का प्रयास किया।
जब भी आरटीआई के द्वारा भ्रष्टाचार पर चोट करने की कोशिश की गई तब-तब कोई न कोई दिक्कत आती रही है। फिर भी 13 वर्षों बाद कठिनाइयों के साथ आरटीआई को सफलता पूर्वक लागू करवाने के लिए हमें अपनी सक्रिय सिविल सोसायटी का धन्यवाद देना चाहिए।
2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले, मनरेगा से जुड़े भ्रष्टाचार, पीडीएस से जुड़े भ्रष्टाचार का खुलासा आरटीआई से ही हो सका। इस कानून की सबसे खास बात यह रही कि इसने न सिर्फ शहरी बल्कि ग्रामीण क्षेत्र में भी आरटीआई समूहों के गठन को प्रोत्साहित किया।
ऐसे आरटीआई कार्यकर्ता जो भ्रष्टाचार का सफलतापूर्वक खुलासा कर रहे हैं और पारदर्शिता को आरटीआई की सहायता से बढ़ा रहे हैं वह हमारे समाज के नए चैंपियन हैं। लेकिन तस्वीर इतनी भी अच्छी नहीं है जितनी हम समझते हैं। राजनितिक दल आज भी इस कानून से बाहर हैं।
राज्य सूचना आयोग (एसआईसी) और केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) में लंबित मामलों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। आयोग में रिक्तियां बढ़ती जा रही हैं, वहीं वर्तमान सरकार ने जो संशोधन पेश किए हैं वो आयोग की प्रतिष्ठा और गंभीरता को कम करने का काम करेंगे। आज सूचनाएं देर से मिल रही हैं या तो नहीं ही मिल रही हैं।
आरटीआई के तहत आने वाले 123 देशों की हालिया रेटिंग भारत के लिए कुछ ज्यादा ही चिंता का विषय है। हालिया रेटिंग में भारत 5वें स्थान से 6वें स्थान पर आ गया है। 2011 में जब रेटिंग की शुरुआत हुई थी उस समय भारत दूसरे नंबर पर था वहीं आज इस रेटिंग में हम 6वें स्थान पर आ गए हैं। यह चिंता का विषय है।
एक्सेस इन्फो (यूरोप) और सेंटर फॉर लॉ एंड डेमोक्रेसी संस्था यह देखती है कि आरटीआई कानून वाले देशों में कैसे इस कानून को कार्यान्वित किया जा रहा है। इसके लिए यह संस्था 150 अंकों का एक पैमाना बनाती है जो सूचना के कानून की ताकत और कमजोरियों को इंगित करता है। इसमें लोगों के बीच कानून की पहुंच, उसका दायरा, अनुरोध प्रक्रिया, अपील, प्रतिबंध, सुरक्षा और प्रचार के उपाय जैसी बातें शामिल हैं।
आरटीआई को सुचारू रूप से लागू न करवाना एक मानसिक समस्या भी है। आम तौर पर अधिकारी आरटीआई को अपने वर्चस्व पर अतिक्रमण के रूप में देखते हैं। कुछ इसे एक परेशानी के रूप में देखते हैं क्योंकि इसके कारण कई बार उन्हें ब्लैकमेलिंग का भी सामना करना पड़ सकता है।
हर कानून की अपनी सीमाएं हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कई मामलों में आरटीआई का उपयोग ब्लैकमेलिंग के लिए किया गया है लेकिन यह बेहद ही कम मामले हैं। इसके कारण जो सच में समाज की भलाई के लिए इस कानून का इस्तेमाल करते हैं हम उन्हें एक ही तराजू में नहीं तौल सकते।
वर्तमान आरटीआई अधिनियम में उन अधिकारियों को दंडित करने का कोई प्रावधान नहीं है जो कमजोर आधार बोलकर जानकारी देने से इनकार कर देते हैं। केंद्रीय और राज्य आयोगों को रिटायर्ड नौकरशाहों द्वारा कब्जा लिया गया है जो पारदर्शिता के बजाय आधिकारिक गोपनीयता के पक्ष में ज्यादा बात करते हैं।जिसकी वजह से आज आयोग में सिविल सोसायटी के सदस्य के व्यापक प्रतिनिधित्व की आवश्यक्ता है।
उत्तरदायित्व और पारदर्शिता भारतीय लोकतंत्र की ताकत का खंभा है और आरटीआई एक ऐसा उपकरण है जो इस खंभे को मजबूत करता है, हमें भारत में आरटीआई को मजबूत करने के लिए बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता है।
सबसे पहले ग्रामीण भारत में शामिल हमारी अधिकांश आबादी आरटीआई एक्ट के विभिन्न प्रावधानों से अवगत नहीं है। इसके लिए सरकार को जागरुकता अभियान शुरू करना चाहिए। सूचना अधिकारी के द्वारा सूचना न देने पर जुर्माने को बढ़ाना चाहिए।
सरकारी विभाग के उन अधिकारियों को प्रशिक्षण देना चाहिए जो सार्वजनिक सूचना अधिकारी और 1 अपीलीय अधिकारी के साथ आरटीआई पर काम करते हैं।
विद्यार्थी हमारा भविष्य हैं और उन्हें मजबूत और उत्तरदायी नागरिक बनाने के लिए उनके पाठ्यक्रम में आरटीआई अधिनियम के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए।
अंत में लेकिन सबसे जरूरी है कि सुरक्षा के नियम कड़े किए जाएं। योजनाओं में भ्रष्टाचार से जुड़ी जानकारी मांगने पर हर रोज आरटीआई एक्टिविस्टों की हत्या हो रही है। सुरक्षा की गुंजाइश खत्म है। जबकि यही लोग सरकार से सवाल पूछकर एक बेहतर लोकतंत्र बनाने में मदद करते हैं।
लेखक पार्टनरशिप फॉर ट्रांसपेरेंसी फंड, वाशिंगटन के सलाहकार हैं और आरटीआई के प्रति लोगों को जागरूक करते रहते हैं।

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