पश्चिम बंगाल में रामनवमी को लेकर बीजेपी और टीएमसी आमने-सामने हैं। बीजेपी हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ विरोध कर रही है, वहीं TMC 'राम सबके हैं' का नारा बुलंद कर रही है।

West Bengal Election: पश्चिम बंगाल में इस साल रामनवमी 27 मार्च का उत्सव केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आगामी चुनावों के लिए एक बड़ा 'सियासी लिटमस टेस्ट' बन गया है।

राज्य भर में करीब 20,000 शोभायात्राएं और जुलूस निकालने का अनुमान है। भारतीय जनता पार्टी और विभिन्न हिंदू संगठन इस मौके पर 5 दिनों तक भव्य कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बना रहे हैं।

बीजेपी इस बार रामनवमी के मंच से बांग्लादेश और बंगाल के विभिन्न जिलों जैसे मुर्शिदाबाद और आसनसोल में हिंदुओं पर हुए कथित अत्याचारों और हत्याओं के मुद्दे को जोर-शोर से उठाने की तैयारी में है।

​आसनसोल और हावड़ा में सुरक्षा का कड़ा पहरा और कानूनी बंदिशें 
रामनवमी की तैयारियों के बीच कानून-व्यवस्था को लेकर सुरक्षा एजेंसियां बेहद सतर्क हैं। विशेष रूप से आसनसोल और हावड़ा जैसे इलाकों पर नजर रखी जा रही है, जहाँ 2018 और 2019 में रामनवमी के दौरान हिंसक झड़पें और आगजनी हुई थी।

कोलकाता हाईकोर्ट ने इस बार भी हावड़ा में रामनवमी जुलूस की अनुमति तो दी है, लेकिन हथियारों के प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। कोर्ट ने 'अंजनी पुत्र सेना' जैसे संगठनों को 26 मार्च की सुबह एक निश्चित समय सीमा के भीतर जुलूस निकालने की अनुमति दी है।

पुलिस प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई भी व्यक्ति कानून हाथ में लेगा या हथियारों का प्रदर्शन करेगा, तो उसके खिलाफ तत्काल सख्त कार्रवाई की जाएगी।

​हथियारों के प्रदर्शन पर तकरार और बीजेपी का अड़ियल रुख 
पुरुलिया और अन्य हिंदू बहुल इलाकों में हथियारों के प्रदर्शन को लेकर तनाव की स्थिति बनी हुई है। बीजेपी के स्थानीय संयोजकों का कहना है कि उनके सभी अखाड़े रजिस्टर्ड हैं और चूंकि हिंदू देवी-देवता शस्त्र धारण करते हैं, इसलिए वे हथियारों के साथ ही रैली निकालेंगे।

दूसरी ओर, मालदा जैसे जिलों में 52 से अधिक संगठनों ने मिलकर 5 किलोमीटर लंबी भव्य रैली निकालने का निर्णय लिया है। मालदा में बीजेपी की उपाध्यक्ष तंद्रा राय चौधरी ने बताया कि इस बार भीड़ पिछले साल के रिकॉर्ड को तोड़ देगी। दिलचस्प बात यह है कि अब रैलियों की परमिशन की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन हो गई है, जिससे विवाद की गुंजाइश कम करने की कोशिश की गई है।

​सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर टीएमसी और 'अस्त्रहीन' संकीर्तन रैली 
बीजेपी के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए तृणमूल कांग्रेस ने भी अपनी रणनीति बदल दी है। टीएमसी के पार्षद और नेता अब सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि "जय श्री राम" कहने से राम सिर्फ बीजेपी के नहीं हो जाते, वे सबके हैं। हुगली जैसे जिलों में टीएमसी 'अस्त्रहीन संकीर्तन रैली' निकालने की तैयारी कर रही है, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि वे हिंदू विरोधी नहीं हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि टीएमसी के स्थानीय नेता इस बार अपनी हिंदू पहचान को बचाने के लिए इन रैलियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेंगे। आसनसोल और दुर्गापुर जैसे क्षेत्रों में टीएमसी कार्यकर्ता खुद अखाड़ों का नेतृत्व कर रहे हैं ताकि वोट बैंक का ध्रुवीकरण रोका जा सके।

​रामनवमी का राजनीतिक इतिहास और बढ़ता क्रेज 
पश्चिम बंगाल में पिछले 10 सालों में रामनवमी का क्रेज अभूतपूर्व तरीके से बढ़ा है। सीनियर जर्नलिस्ट्स के मुताबिक, लेफ्ट के शासनकाल में भी आरएसएस के लोग जुलूस निकालते थे, लेकिन तब इसका राजनीतिकरण नहीं हुआ था। 2018 के रानीगंज और आसनसोल दंगों के बाद बंगाल की राजनीति में एक बड़ा मोड़ आया, जिससे ध्रुवीकरण तेज हुआ।

इसका सीधा लाभ 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को मिला, जहाँ उसकी सीटें 2 से बढ़कर 18 हो गईं। इस बार भी नॉर्थ बंगाल के 8 जिलों में 150 से ज्यादा जुलूस निकलने की उम्मीद है, जिसमें 35 लाख से ज्यादा लोग शामिल हो सकते हैं। साध्वी प्राची जैसे फायरब्रांड नेताओं की मौजूदगी इन रैलियों के राजनीतिक तापमान को और बढ़ा सकती है।